झारखंड की लोक चित्रकला शैली : जादोपटिया
उपराजधानी दुमका की सरकारी दीवारों पर, बासुिकनाथ से दुमका हवाई अड्डे तक, आज झारखंड की उस जादोपटिया चित्रकला का दिग्दर्शन आम से लेकर खास तक कर रहे हैं, जिसकी खोज में मैंने एक-दो नहीं, पूरे दस साल लगाये. 1990 का वह साल था. हम झारखंड के पाकुड़ से दुमका आये थे. पाकुड़ में रहते हुए संताल और पहाड़िया जनजातीय समाज पर पर्याप्त ज्ञान अर्जित कर चुका था. आकाशवाणी भागलपुर के ग्राम जगह कार्यक्रम में पहाड़ि और संताल जनजातीय समाज और उनकी संस्कृति से जुड़े विषयों के लिए मैं करीब-करीब नियमित वार्ताकार था. उन्हीं दिनों 1855 के संतरल विद्रोह के एक मात्र स्थापत्य, पाकुड़ के मार्टेलो टावर, के संरक्षण के लिए मैं कई स्तर पर कार्य कर चुका था. यह टावर पाकुड में हमारे घर के बहुत पास, किंतु बेहद उपेक्षित था. इतना उपेक्षित की, जब मेरी पहल पर महेशपुर के तत्कालीन विधायक ने इसके संरक्षण से जुड़ा सवाल बिहार विधानसभा में उठाया था और पुरातत्व विभाग ने अपने सयक निदेशक अमिताभ जी को रिपोर्ट तैयार करने के लिए पाकुड़ भेजा था, तब उन्हें इस टावर के स्थान के विषय में भी बताने वाला कोई नहीं मिला. बरसात का दिन था. अमिताभ जी कभी हिरणपुर, तो कभी लिट्टीपाड़ा भटकते रहे. अंत में उन्हें किसी ने मुझ तक पहुंचाया. मैंने उन्हें टावर दिखाया, पूरी रिपाेर्ट ड्राफ्ट करायी और मूल टावर की 1972 में ली गयी तस्वीर की प्रति उन्हें दी. यह तस्वीर पाकुड के प्रसिद्ध छायाकार बैद्यनाथ जायसवाल ने खींची थी और उन्हीं से वह मुझे प्राप्त हुई थी.बहरहाल, दुूमका आने के बाद जनजातीय संस्कृति और इतिहास से जुड़े ऐसे विषय की मेरी खोज का क्रम जारी रहा. उस समय तक बिहार की मधुबनी पेंटिंग के विषय में मैं बहुत कुछ ज्ञान प्राप्त कर चुका था और मेरा विश्वास था कि संताल परगना के जनजातीय समाज से जुड़ी भी कोई रैखिक सांस्कृतिक परंपरा जरूर रही होगी. तब तक संताल भित्ती चित्र से मेरा साक्षात्कार बहुत गहराई तक हो चुका था. उसी खाज ने मुझे जादोपटिया पेंटिंग तक पहुुंचाया, जो न केवल लुप्त हो चुकी थी, बल्कि कला जगत में उसकी कोई चर्चा तक नहीं थी. कला- संस्कृति विभाग, बिहार सरकार को भी उसके विषय में जानकारी नहीं थी. गांव में लोग उसे अलग-अलग नामों से जानते तो थे, किंतु उसके सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति नकारात्मक अवधारणा स्थापित हो चुकी थी.
कलाकारोंं का हाल यह था कि जब हम उनके गांव पहुंचते थे, तब हमसे बातचीत करने की जगह डर कर खोतों की ओर निकल जाते थे. वे कहां-कहां बसे हुए हैं, इसकी भी ठोस जानकारी मुझे नहीं थी और न ही यह जानने का कोई स्रोत था. उस समय दुमका के उपायुक्त थे अंजनी कुमार सिंह. वे आज बिहार सरकार में मुख्य सचिव हैं. मैंने उनसे मदद मांग. उन्होंने एक सरकारी जीप, चाक और इंधन सहित, उपलब्ध कराया. जिले के सभी बीडीओ को मेंरे काम में सहयोग करने का निर्देश दिया. मेरे साथ कलाकार मीनू आनंद भी हो गयीं और फिर से जादोपटिया के कलाकारों की तलाश में गांव-गांव घूमने लगे. आज वह जादोपटिया पेंटिंग झारखंड की प्रमुख लोक चित्रकला है. इसे इस मुकाम तक पहुंचाने में मैंने और मीनू आनंद ने जो कठिन श्रम किया, उसका परिणाम यह है.
मीनू आनंद जादोपटिया की प्रथम गैर वंशानुगत कलाकार है. दुमका से पटना, दिल्ली, हरियाणा के सूरज कुंड, दिल्ली के सरस मेले और अगरतला के सांस्कृतिक महोत्सव तक इस कला को पहुंचने में मीनू मेरे साथ-साथ रही. उन्हें कई सम्मन और पुरस्कार भी मिले. यूनिसेफ ने 2002 का अपना कैलेंडर भी जादोपटिया शैली में डेवलप करने का अवसर हमें दिया. भारत और राज्य सरकार के कई विभागों का तो सहयोग था ही.
इस कला को बचाने के उद्देश्य से ही हमने दुमका में 'अादिवासी चित्रकला अकादमी ' की स्थापना की. मैं अध्यक्ष था, मीनू आनंद सचिव.
जादोपटिया पेंटिंग
जादोपटिया चित्रकला शैली भारतीय पट चित्र शैली की श्रृंखला में मिथिला एवं कालीघाट चित्रकला की भगिनी है., जो संताल आदिवासी की सांस्कृतिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि से जुडी। यह संतालों के सांस्कृतिक दर्शन की रैखिक थाति.
अन्य लोक चित्रकला की भांति ‘जादोपटिया’ एक पारंपरिक और पुरानी लोक चित्रकला शैली है, जो कालांतर में संताल आदिवासी समाज की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विकसित हुई. समय के साथ यह प्राय: लुप्त हो चुकी थी. अनेक प्रयासों के बाद इसे बचा लेने में सफलता मिली. आज जिस प्रकार बिहार मधुबनी पेंटिंग पर गर्व करता है. उसी प्रकार जादोपटिया पेंटिंग झारखंड का गौरव है.
आरके नीरद : 9431177865
मीनू आनंद : 09867217754