Sunday, 4 December 2016

‍@niradrk

झारखंड की लोक चित्रकला शैली : जादोपटिया

उपराजधानी दुमका की सरकारी दीवारों पर, बासुिकनाथ से दुमका हवाई अड्डे तक, आज झारखंड की उस जादोपटिया चित्रकला का दिग्दर्शन आम से लेकर खास तक कर रहे हैं, जिसकी खोज में मैंने एक-दो नहीं, पूरे दस साल लगाये. 1990 का वह साल था. हम झारखंड के पाकुड़ से दुमका आये थे. पाकुड़ में रहते हुए संताल और पहाड़िया जनजातीय समाज पर पर्याप्त ज्ञान अर्जित कर चुका था. आकाशवाणी भागलपुर के ग्राम जगह कार्यक्रम में पहाड़ि और संताल जनजातीय समाज और उनकी संस्कृति से जुड़े विषयों के लिए मैं करीब-करीब नियमित वार्ताकार था. उन्हीं दिनों 1855 के संतरल विद्रोह के एक मात्र स्थापत्य, पाकुड़ के मार्टेलो टावर, के संरक्षण के लिए मैं कई स्तर पर कार्य कर चुका था. यह टावर पाकुड में हमारे घर के बहुत पास, किंतु बेहद उपेक्षित था. इतना उपेक्षित की, जब मेरी पहल पर महेशपुर के तत्कालीन विधायक ने इसके संरक्षण से जुड़ा सवाल बिहार विधानसभा में उठाया था और पुरातत्व विभाग ने अपने सयक निदेशक अमिताभ जी को रिपोर्ट तैयार करने के लिए पाकुड़ भेजा था, तब उन्हें इस टावर के स्थान के विषय में भी बताने वाला कोई नहीं मिला. बरसात का दिन था. अमिताभ जी कभी हिरणपुर, तो कभी लिट्टीपाड़ा भटकते रहे. अंत में उन्हें किसी ने मुझ तक पहुंचाया. मैंने उन्हें टावर दिखाया, पूरी रिपाेर्ट ड्राफ्ट करायी और मूल टावर की 1972 में ली गयी तस्वीर की प्रति उन्हें दी. यह तस्वीर पाकुड के प्रसिद्ध छायाकार बैद्यनाथ जायसवाल ने खींची थी और उन्हीं से वह मुझे प्राप्त हुई थी.
बहरहाल, दुूमका आने के बाद जनजातीय संस्कृति और इतिहास से जुड़े ऐसे विषय की मेरी खोज का क्रम जारी रहा. उस समय तक बिहार की मधुबनी पेंटिंग के विषय में मैं बहुत कुछ ज्ञान प्राप्त कर चुका था और मेरा विश्वास था कि संताल परगना के जनजातीय समाज से जुड़ी भी कोई रैखिक सांस्कृतिक परंपरा जरूर रही होगी. तब तक संताल भित्ती चित्र से मेरा साक्षात्कार बहुत गहराई तक हो चुका था. उसी खाज ने मुझे जादोपटिया पेंटिंग तक पहुुंचाया, जो न केवल लुप्त हो चुकी थी, बल्कि कला जगत में उसकी कोई चर्चा तक नहीं थी. कला- संस्कृति विभाग, बिहार सरकार को भी उसके विषय में जानकारी नहीं थी. गांव में लोग उसे अलग-अलग नामों से जानते तो थे, किंतु उसके सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति नकारात्मक अवधारणा स्थापित हो चुकी थी.
कलाकारोंं का हाल यह था कि जब हम उनके गांव पहुंचते थे, तब हमसे बातचीत करने की जगह डर कर खोतों की ओर निकल जाते थे. वे कहां-कहां बसे हुए हैं, इसकी भी ठोस जानकारी मुझे नहीं थी और न ही यह जानने का कोई स्रोत था. उस समय दुमका के उपायुक्त थे अंजनी कुमार सिंह. वे आज बिहार सरकार में मुख्य सचिव हैं. मैंने उनसे मदद मांग. उन्होंने एक सरकारी जीप, चाक और इंधन सहित, उपलब्ध कराया. जिले के सभी बीडीओ को मेंरे काम में सहयोग करने का निर्देश दिया. मेरे साथ कलाकार मीनू आनंद भी हो गयीं और फिर से जादोपटिया के कलाकारों की तलाश में गांव-गांव घूमने लगे. आज वह जादोपटिया पेंटिंग झारखंड की प्रमुख लोक चित्रकला है. इसे इस मुकाम तक पहुंचाने में मैंने और मीनू आनंद ने जो कठिन श्रम किया, उसका परिणाम यह है. 
मीनू आनंद जादोपटिया की प्रथम गैर वंशानुगत कलाकार है. दुमका से पटना, दिल्ली, हरियाणा के सूरज कुंड, दिल्ली के सरस मेले और अगरतला के सांस्कृतिक महोत्सव तक इस कला को पहुंचने में मीनू मेरे साथ-साथ रही. उन्हें कई सम्मन और पुरस्कार भी मिले. यूनिसेफ ने 2002 का अपना कैलेंडर भी जादोपटिया शैली में डेवलप करने का अवसर हमें दिया. भारत और राज्य सरकार के कई विभागों का तो सहयोग था ही. 
इस कला को बचाने के उद्देश्य से ही हमने दुमका में 'अादिवासी चित्रकला अकादमी ' की स्थापना की. मैं अध्यक्ष था, मीनू आनंद सचिव.
जादोपटिया पेंटिंग 
जादोपटिया चित्रकला शैली भारतीय पट चित्र शैली की श्रृंखला में मिथिला एवं कालीघाट चित्रकला की भगिनी है., जो संताल आदिवासी की सांस्कृतिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि से  जुडी। यह संतालों के सांस्कृतिक दर्शन की रैखिक थाति.
अन्य लोक चित्रकला की भांति ‘जादोपटिया’ एक पारंपरिक और पुरानी लोक चित्रकला शैली है, जो कालांतर में संताल आदिवासी समाज की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में  विकसित हुई. समय के साथ यह प्राय: लुप्त हो चुकी थी. अनेक प्रयासों के बाद इसे बचा लेने में सफलता मिली. आज जिस प्रकार बिहार मधुबनी पेंटिंग पर गर्व करता है. उसी प्रकार जादोपटिया पेंटिंग झारखंड का गौरव है.
आरके नीरद : 9431177865
मीनू आनंद : 09867217754


Friday, 25 December 2015

जलवायु परिवर्तन बढ़ा सकता है बिहार में कृषि संकट

जलवायु परिवर्तन बढ़ा सकता है बिहार में कृषि संकट 
आरके नीरद
विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन से अगले 5-10 सालों में कृषि की समस्या विकराल हो सकती है. इसका मतलब है कि बिहार में कृषि की चुनौतियां और बढ़ेंगी. राज्य की दो तिहाई आबादी की कृषि पर और कृषि की प्रकृति पर निर्भरता से जुड़ी समस्याएं पहले से कायम हैं.  राज्य सरकार के दूसरे कृषि रोड मैप की अवधि 2017 में पूरी होने जा रही है.  हाल के वर्षो दो कृषि रोड मैप से राज्य में खेती की सेहत में सुधार जरूर आया, मगर चुनौतियों के मुकाबले उपलब्धियों का ग्राफ और मेहनत की मांग करता है. जाहिर है कि कृषि के क्षेत्र में नयी सरकार का टास्क बड़ा है.
प्रथम दृष्टि में राज्य में कृषि की पहली समस्या सिंचाई की है. समय पर खाद-बीज की उपलब्धता इसकी दूसरी बड़ी समस्या है. तीसरी समस्या कृषि उपज की खरीद और स्थानीय बाजार व्यवस्था की कमी है. चौथी समस्या अनाज के भंडारण की व्यवस्था और सरकारी खरीद  के बाद अनाज की पूरी कीमत किसानों को समय उपलब्ध करना तथा उस अनाज की सुरक्षा है. पांचवीं समस्या उत्पादकता बढ़ाने, कृषि संबंधी संस्थागत व्यवस्था में व्यापक सुधार, खेती के जोखिम को कम करने के बड़े उपाय तथा कृषि भूमि के पैटर्न में बदलाव है. इन समस्याओं को हल करने की दिशा में अब तो प्रयोग और प्रयास हुए हैं, नि:संदेह किसानों को उसका लाभ  मिला है, लेकिन उस दिशा में पहले से ज्यादा काम करने की जरूरत होगी.
राज्य में औसत वर्षापात के मामले में जिलों के बीच काफी अंतर है. 2013 में देखें, तो 18 जिलों में औसत से ज्यादा वर्षापात हुआ, जबकि 20 जिलों में औसत से काफी कम. यह स्थिति करीब-करीब हर दो साल पर आती रही है. वर्षापात में जिलों के बीच की यह असमानता बड़ी चुनौती है और इससे निबटने के लिए सिंचाई क्षमता और जल प्रबंधन के कोशल को बढ़ाने की जरूरत होगी.
राज्य में दो दर्जन से अधिक बड़ी सिंचाई परियोजनाएं हैं, जो सालों से अधूरी पड़ी हैं. इन परियोजनाओं पर अब तक करोड़ों  रुपये खर्च हुए हैं, जबकि इनकी आरंभिक लागत ..... करोड़ थी. इसी क्रम में दो बड़ी सिंचाई परियोजनाएं और भी हैं. एक पूर्वी गंडक सिंचाई परियोजना और दूसरी पश्चिमी कोसी सिंचाई परियोजना. ये दोनों करीब चार दशक से अधूरी हैं, जबकि जमीनी स्तर पर इन परियोजनाओं पर बहुत काम हो चुका है. इन दोनों सिंचाई परियोजनाओं को दो-ढ़ाई साल में पूरा किया जा सकता है. इनसे करीब 10 लाख हेक्टेयर जमीन की क्षमता बढ़ेगा और करीब 20 लाख टन अतिरिक्त खाद्यान्न का उत्पादन हो सकेगा. विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे राज्य में 1500 करोड़ की अतिरिक्त खुशहाली आयेगी.
किसानों की जीविका के वैकल्पिक साधन चाहिए 
खेती पर निर्भर आबादी के लिए जीविका के वैकल्पिक साधन की जरूरत है. भूमि उपायोग के पैटर्न में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं है, जबकि कृषि पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता गया है. आबादी के अनुपात में कृषि भूमि नहीं बढ़ सकती, लेकिन कृषि भूमि पर निर्भरता को कम करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था हो सकती है. इसकी बड़ी जरूरत है. राज्य के 90 फीसदी ऐसे किसान हैं, जिनके पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है. इन्हीं किसानों के पास राज्य की 50 फीसदी कृषि भूमि है. 30 फीसदी कृषि भूमि संयुक्त है. ऐसे में लघु और सीमांत किसानों के लिए जीविका के वैकल्पिक साधन जुटाने की चुनौती है. यह वैकल्पिक साधन कृषि आधार ही हो, यह भी जरूरी है, ताकि कृषि में उनकी निरंतरता बनी रहे.
राज्य में कृषि क्षेत्र में अब भी निवेश की दर कम और निवेश का आकार छोटा है. इसे बढ़ाने की जरूरत होगी. तभी कृषि के स्वरूप, उत्पादकता, कृषि उपज की कीमत और कृषि समर्थित छोटे-बड़े उद्योग के विस्तार के अनुकूल परिस्थितियां तैयार हो सकेंगी.
जोखिम को कम करने के करने होंगे उपाय 
किसान खेती से जुड़े रहें और व्यक्तिगत पूंजी निवेश की दर बढ़े, इसके लिए सरकार को जोखिम करने वाले प्रभावी और भी उपाय विकसित करने होंगे. कृषि की मौसम पर निर्भरता कम नहीं हो पा रही हैं. इस सदी में छह बार ऐसा हुआ है, जब पूरे साल में औसत से कम वर्षा हुई. सूखे, बाढ़ और असमान वर्षापात के बड़े असर को देखते हुए कृषि के जोखिम को कम करने को उपायों को बढ़ाना होगा. 
बढ़ानी होगी औसत उत्पादकता
बिहार में उत्पदकता दर को और बढ़ाने की जरूरत है. खास कर दलहन, मोटे अनाज और गेहूं के मामले में. धान की उत्पादकता में बिहार ने चीन के रिकॉर्ड को तोड़ा. आलू में भी उत्पादकता दर में रिकॉर्ड वृद्धि हुई, लेकिन इस उपलब्धि को सीमित क्षेत्र से निकाल कर पूरे राज्य में विस्तार देने की चुनौती अब भी बनी है. राज्य के 47 फीसदी किसान अब भी 1.5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से उत्पादन करते हैं और हमारी 43 फीसदी आवश्यकता यही पूरा करते हैं. इन्हें उत्पादकता के उच्च दर से जोड़ने की जरूरत है.


उपलब्धियां
 नालंदा के किसानों ने धान उत्पादन में चीन के रिकॉर्ड को तोड़ा.
कृषि में इंद्रधनुषी बदलाव आया है. इसके विस्तार की जरूरत है.
मधु उत्पादन में बिहार देश में पहला स्थान रखता है.


छोटे होते खेत, बढ़ता बोझ
कृषि भूमि का औसत आकार तेजी से छोटा हुआ है. यह एक बड़ी चुनौती है, जिसका सीधा नहीं, वैकल्पिक समाधान हो सकता है. सरकार को इस पर प्राथमिकता के आधार पर वर्क आउट करना होगा. 1995-96 में कृषि भूमि का औसत आकार 0.75 हेक्टेयर था. 2005-06 में यह 4.43 हुआ. पिछले एक दशक में यह आकार और भी छोटा हुआ है.
जलवायु परिवर्तन बढ़ा सकता है बिहार में कृषि संकट 
आरके नीरद
विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन से अगले 5-10 सालों में कृषि की समस्या विकराल हो सकती है. इसका मतलब है कि बिहार में कृषि की चुनौतियां और बढ़ेंगी. राज्य की दो तिहाई आबादी की कृषि पर और कृषि की प्रकृति पर निर्भरता से जुड़ी समस्याएं पहले से कायम हैं.  राज्य सरकार के दूसरे कृषि रोड मैप की अवधि 2017 में पूरी होने जा रही है.  हाल के वर्षो दो कृषि रोड मैप से राज्य में खेती की सेहत में सुधार जरूर आया, मगर चुनौतियों के मुकाबले उपलब्धियों का ग्राफ और मेहनत की मांग करता है. जाहिर है कि कृषि के क्षेत्र में नयी सरकार का टास्क बड़ा है.
प्रथम दृष्टि में राज्य में कृषि की पहली समस्या सिंचाई की है. समय पर खाद-बीज की उपलब्धता इसकी दूसरी बड़ी समस्या है. तीसरी समस्या कृषि उपज की खरीद और स्थानीय बाजार व्यवस्था की कमी है. चौथी समस्या अनाज के भंडारण की व्यवस्था और सरकारी खरीद  के बाद अनाज की पूरी कीमत किसानों को समय उपलब्ध करना तथा उस अनाज की सुरक्षा है. पांचवीं समस्या उत्पादकता बढ़ाने, कृषि संबंधी संस्थागत व्यवस्था में व्यापक सुधार, खेती के जोखिम को कम करने के बड़े उपाय तथा कृषि भूमि के पैटर्न में बदलाव है. इन समस्याओं को हल करने की दिशा में अब तो प्रयोग और प्रयास हुए हैं, नि:संदेह किसानों को उसका लाभ  मिला है, लेकिन उस दिशा में पहले से ज्यादा काम करने की जरूरत होगी.
राज्य में औसत वर्षापात के मामले में जिलों के बीच काफी अंतर है. 2013 में देखें, तो 18 जिलों में औसत से ज्यादा वर्षापात हुआ, जबकि 20 जिलों में औसत से काफी कम. यह स्थिति करीब-करीब हर दो साल पर आती रही है. वर्षापात में जिलों के बीच की यह असमानता बड़ी चुनौती है और इससे निबटने के लिए सिंचाई क्षमता और जल प्रबंधन के कोशल को बढ़ाने की जरूरत होगी.
राज्य में दो दर्जन से अधिक बड़ी सिंचाई परियोजनाएं हैं, जो सालों से अधूरी पड़ी हैं. इन परियोजनाओं पर अब तक करोड़ों  रुपये खर्च हुए हैं, जबकि इनकी आरंभिक लागत ..... करोड़ थी. इसी क्रम में दो बड़ी सिंचाई परियोजनाएं और भी हैं. एक पूर्वी गंडक सिंचाई परियोजना और दूसरी पश्चिमी कोसी सिंचाई परियोजना. ये दोनों करीब चार दशक से अधूरी हैं, जबकि जमीनी स्तर पर इन परियोजनाओं पर बहुत काम हो चुका है. इन दोनों सिंचाई परियोजनाओं को दो-ढ़ाई साल में पूरा किया जा सकता है. इनसे करीब 10 लाख हेक्टेयर जमीन की क्षमता बढ़ेगा और करीब 20 लाख टन अतिरिक्त खाद्यान्न का उत्पादन हो सकेगा. विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे राज्य में 1500 करोड़ की अतिरिक्त खुशहाली आयेगी.
किसानों की जीविका के वैकल्पिक साधन चाहिए 
खेती पर निर्भर आबादी के लिए जीविका के वैकल्पिक साधन की जरूरत है. भूमि उपायोग के पैटर्न में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं है, जबकि कृषि पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता गया है. आबादी के अनुपात में कृषि भूमि नहीं बढ़ सकती, लेकिन कृषि भूमि पर निर्भरता को कम करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था हो सकती है. इसकी बड़ी जरूरत है. राज्य के 90 फीसदी ऐसे किसान हैं, जिनके पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है. इन्हीं किसानों के पास राज्य की 50 फीसदी कृषि भूमि है. 30 फीसदी कृषि भूमि संयुक्त है. ऐसे में लघु और सीमांत किसानों के लिए जीविका के वैकल्पिक साधन जुटाने की चुनौती है. यह वैकल्पिक साधन कृषि आधार ही हो, यह भी जरूरी है, ताकि कृषि में उनकी निरंतरता बनी रहे.
राज्य में कृषि क्षेत्र में अब भी निवेश की दर कम और निवेश का आकार छोटा है. इसे बढ़ाने की जरूरत होगी. तभी कृषि के स्वरूप, उत्पादकता, कृषि उपज की कीमत और कृषि समर्थित छोटे-बड़े उद्योग के विस्तार के अनुकूल परिस्थितियां तैयार हो सकेंगी.
जोखिम को कम करने के करने होंगे उपाय 
किसान खेती से जुड़े रहें और व्यक्तिगत पूंजी निवेश की दर बढ़े, इसके लिए सरकार को जोखिम करने वाले प्रभावी और भी उपाय विकसित करने होंगे. कृषि की मौसम पर निर्भरता कम नहीं हो पा रही हैं. इस सदी में छह बार ऐसा हुआ है, जब पूरे साल में औसत से कम वर्षा हुई. सूखे, बाढ़ और असमान वर्षापात के बड़े असर को देखते हुए कृषि के जोखिम को कम करने को उपायों को बढ़ाना होगा. 
बढ़ानी होगी औसत उत्पादकता
बिहार में उत्पदकता दर को और बढ़ाने की जरूरत है. खास कर दलहन, मोटे अनाज और गेहूं के मामले में. धान की उत्पादकता में बिहार ने चीन के रिकॉर्ड को तोड़ा. आलू में भी उत्पादकता दर में रिकॉर्ड वृद्धि हुई, लेकिन इस उपलब्धि को सीमित क्षेत्र से निकाल कर पूरे राज्य में विस्तार देने की चुनौती अब भी बनी है. राज्य के 47 फीसदी किसान अब भी 1.5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से उत्पादन करते हैं और हमारी 43 फीसदी आवश्यकता यही पूरा करते हैं. इन्हें उत्पादकता के उच्च दर से जोड़ने की जरूरत है.


उपलब्धियां
 नालंदा के किसानों ने धान उत्पादन में चीन के रिकॉर्ड को तोड़ा.
कृषि में इंद्रधनुषी बदलाव आया है. इसके विस्तार की जरूरत है.
मधु उत्पादन में बिहार देश में पहला स्थान रखता है.


छोटे होते खेत, बढ़ता बोझ
कृषि भूमि का औसत आकार तेजी से छोटा हुआ है. यह एक बड़ी चुनौती है, जिसका सीधा नहीं, वैकल्पिक समाधान हो सकता है. सरकार को इस पर प्राथमिकता के आधार पर वर्क आउट करना होगा. 1995-96 में कृषि भूमि का औसत आकार 0.75 हेक्टेयर था. 2005-06 में यह 4.43 हुआ. पिछले एक दशक में यह आकार और भी छोटा हुआ है.

Sunday, 20 December 2015

बिहार में ठंड से औसतन हर साल 118 मौत
आरके नीरद
बिहार में ठंड में बेघरों और असहायों को बचाने को लेकर आपदा प्रबंधन विभाग ने सभी जिलों को अलर्ट जारी कर दिया है. 25 दिसंबर से जिलों से हर दिन रिपोर्ट ली जायेगी. इसमें ठंड से बचाव और नुकसान की जानकारी होगी. दरअसल, सरकार की बड़ी चिंता जनवरी के अंतिम और जनवरी के पहले दो सप्ताह में ठंड से मौत को रोकने की है.
इस सदी के 14 सालों में ठंड से अकेले बिहार में 1647 लोगों की मौत हुई. यानी हर साल औसतन करीब 118 लोग ठंड से मरे. ठंड से मौत के मामले में यह संख्या बिहार को देश में तीसरे नंबर पर खड़ा करती है. इस मामले में उत्तर प्रदेश पहले और पंजाब दूसरे नंबर पर हैं, जहां 2001 से 2014 के बीच क्रमश: 2623 और 1768 लोगों की मौत हुई. इस अवधि में शीत लहर से देश में हर साल 718 लोग मरे. 14 सालों में देश में कम-से-कम 10,933 लोगों की मौत ठंड से हुई. यह आंकड़ा ओपन सरकारी डाटा प्लेटफार्म (ओजीडी) का है. वैसे राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के पास ठंड से मौत का आधिकारिक आंकड़ा नहीं है.
 प्राकृतिक आपदा है शीत लहर
केंद्र सरकार ने 2012 में शीत लहर को प्राकृतिक आपदा की सूची में शामिल किया और आपदा प्रबंधन विभाग को इस पर सक्रिय किया गया. उस साल ठंड से देश भर में सबसे ज्यादा (करीब एक हजार) मौतें हुई थीं. दिसंबर के अंतिम सप्ताह में तापमान पांच डिग्री से नीचे चला गया था.  राज्य सरकार शीत लहर से बचाव के लिए हर साल अलाव की व्यवस्था करती है और बेसहारा लोगों के बीच कंबल बांटती है. 2014 में 7381 क्विंटल लकड़ी जलायी गयी और 1600 कंबल बांटे गये.
मौत की बड़ी वजह बेघर
ठंड से मरने वालों की संख्या के मामले में बिहार भले तीसरे नंबर पर हो, बेघरों की संख्या और राज्य की जनसंख्या के अनुपात के आधार पर यह आंकड़ा उत्तर प्रदेश और पंजाब से ज्यादा गंभीर है. ठंड से मरने वालों में ज्यादातर बेघर लोग हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में 449787 परिवार (17.73 लाख आबादी) और बिहार में 9818 परिवार (45.58 हजार आबादी) बेघर हैं. उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 18.56 प्रतिशत, पंजाब में 2.63 प्रतिशत और बिहार में 2.57 प्रतिशत बेघर हैं.  सुप्रीम कोर्ट ने 2001 एवं 2011 में बेघर लोगों को बेहतर आश्रय देने का आदेश दूसरे राज्यों के साथ-साथ बिहार को भी दिया .

ठंड के कारण हुई मौतें 
(2001-2014)
वर्ष   मौत
2001   641
2002   525
2003   835
2004   570
2005 646
2006   694
2007   872
2008 836
2009   742
2010 937
2011   849
2012 997
2013   946
2014   913
(स्नेत : ओजीडी)

ठंड  से कुल मौतों का राज्यवार वितरण (2001-2014) 
राज्य ठंड से मौत
उत्तर प्रदेश 2623
पंजाब 1768
बिहार 1647
हरियाणा 866
झारखंड 813
दिल्ली 652
गुजरात 399
हिमाचल प्रदेश 358
राजस्थान 352
उत्तराखंड 318
मध्य प्रदेश 282
पश्चिम बंगाल 233
महाराष्ट्र 227
ओड़िशा   113
छत्तीसगढ़ 70
जम्मू-कश्मीर में 60
आंध्र प्रदेश 56
अरु णाचल प्रदेश 22
असम 17
तमिलनाडु 16
कर्नाटक 15
मेघालय 12
सिक्किम 7
चंडीगढ़ 5
त्रिपुरा 2
गोवा,केरल, लक्षद्वीप, णिपुरम, मिजोरम, नागालैंड, पुडुचेरी, दादर-नगर हवेली, दमन और दीव, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह  में 14 सालों में एक भी मौत नहीं. 

फैक्ट्स : देश एक नजर 
24.39 करोड़ परिवार देश में. 17.01 करोड़ (73.44}) ग्रामीण और 6.97 करोड़ (26.56}) शहरी.
90 लाख (5.03}) ग्रामीण परिवारों में  बेघर.
 2.29 करोड़ (12.83}) ग्रामीण परिवार की मुखिया महिला.
2.16 करोड़ (12.03}) महिला मुखिया वाले ग्रामीण परिवार बेघर.

फैक्ट्स : बिहार  एक नजर 
राज्य में एक दशक में चार हजार बढ़े बेघर
बिहार में बेघरों की तादाद बढ़कर 46 हजार हो गयी है. एक दशक पहले यह संख्या 42 हजार थी. बिहार में 9818 परिवारों के पास अपना घर नहीं है. इन परिवारों की कुल आबादी 45 584 है. इनमें 24 231 पुरूष हैं. इन बेघरों में 6775 परिवारों के 32993 सदस्य ग्रामीण इलाके में रहते हैं, जबकि शहरी क्षेत्र के 3043 परिवारों के 12591 लोगों के पास घर नहीं है. 28 फरवरी 2011 को देश भर में हुए सव्रेक्षण के इन ताजा आंकड़ों को जगनणना निदेशालय ने जारी कर दिया.

कौन होते हैं बेघर
ऐसे परिवार या परिवारों के सदस्य जो सड़क के किनारे, प्लेटफार्म, फ्लाई ओवर या सार्वजनिक स्थानों की सीढ़ियों के नीचे या ह्यूम पाइप में रहते हैं.
28 शहरों के बेघरों के लिए बनने हैं 50 हजार घर
राज्य समेकित शहरी विकास योजना के तहत सरकार शहरी इलाके में रहने वाले बेघरों के लिए 50 हजार आवासों का निर्माण सरकार को कराना है. पटना से सटे फुलवारीशरीफ में बने ऐसे 192 आवास बेघरों को दिये गये हैं.









जजों की कमी से अदालतों पर बढ़ रहा मुकदमों की बोझ
आरके नीरद
चार दिन पहले (15 दिसंबर) पटना उच्च न्यायालय ने हत्या के एक सजायाफ्ता व्यक्ति की जमानत याचिका पर पहले सुनायी करने के  उसके अनुरोध को ठुकरा दिया. न्यायालय ने ऐसा इसलिए किया कि सब के लिए न्याय के समान अवसर के सिद्धांत का अतिक्रमण न हो. अदालत ने यह भी टिपण्णी की कि 56 हजार जमानत याचिकाएं  पटना उच्च न्यायालय में  लंबित हैं.  विभिन्न मामलों में सजा प्राप्त हजारों लोग जमान नहीं मिलने के कारण जेलों में बंद हैं. सिविल और अपराधिक प्रकृति के 1.35 लाख मुकदमे पटना उच्च न्यायालय के समक्ष विचार के लिए पड़े हैं. यह आंकड़ा बेशक सामान्य नहीं है. बिहार के मुकाबले बंबई हाइकोर्ट का क्षेत्रधिकार बड़ा है और उसके अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या भी बिहार से ज्यादा है. फिर भी बंबई हाई कोर्ट के समक्ष अग्रिम जमानत की केवल 756 और नियमित 1000 याचिकाएं लंबित हैं. त्वरित न्याय और मुकदमों के निष्पादन में क्या हैं बड़ी बाधाएं? देश और बिहार में कैसे और क्यों बढ़ रहा है मुकदमों का बोझ. एक रिपोर्ट.

सुप्रीम कोर्ट की त्रैमासिक रिपोर्ट के विेषण के अनुसार बिहार की निचली अदालतों में हर तीन माह में करीब एक लाख नये मुकदमे दर्ज होते हैं, जबकि मुकदमों के निष्पादन की दर नये मुकदमों की संख्या की दृष्टि से 70 से 75 फीसदी के करीब है. यानी हार तीन माह में 25 से 30 फीसदी मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है. यही हाल पटना हाई कोर्ट का है. हर तीन माह में 20 से 25 हजार नये मुकदमे यहां आते हैं, जबकि निष्पादन दर नये मुकदमों की संख्या की तुलना में 90 से 95 फीसदी है. यानी यहां भी पुराने मामलों का बोझ बढ़ रहा है. स्थिति यह है कि साल 2013 की अंतिम तिमाही में 69 हजार से ज्यादा मुकदमे निबटाये जाने के बाद भी उस साल के 31 दिसंबर तक बिहार की निचली अदालतों में 18 लाख 07 हजार 782 मुकदमे लंबित रह गये. अगले छह माह में इस संख्या में और सात हजार का इजाफा हो गया, जबकि अप्रैल से जून के बीच 78 हजार से ज्यादा मुकदमे निबटाये गये. उस अवधि में 1.07 लाख 782 नये मुकदमे दर्ज हुए थे. इससे साफ है कि जिस तेजी से मुकदमों को निचली अदालतें निबटा रही हैं, उसी अनुपात में मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है.
इस तरह बढ़ रहा मुकदमों का बोझ
इसी तरह पटना उच्च न्यायालय में भी लंबित मुकदमों की संख्या बढ़ रही है. 31 दिसंबर को जहां 1.32 लाख 155 मुकदमे लंबित थे, वहीं जुलाई 2014 के अंत तक यह संख्या बढ़ कर 1.33 लाख 44 हो गयी. आज की तिथि में यहां सिविल और क्रिमिनल लंबित मुकदमों की संख्या 1.35 लाख हो गयी है.
मुकदमों में फंसी है हजारों एकड़ जमीन
राज्य के सिविल कोर्ट में लंबित मुकदमों की बात करें, तो इनकी संख्या लगभग 19 लाख है. स्पष्ट है कि यह संख्या सामान्य नहीं है. जहां मुकदमों के इस बोझ को कम करना अदालतों के लिए बड़ी चुनौती है, वहीं इसके पक्षकारों के लिए न्याय पाना बड़े सब्र का हिस्सा. इन लंबित मुकदमों में बड़ी संख्या वैसे भूमि विवाद के हैं, जिनमें दशकों से अदालती फैसले की बजाय तारीखें मिल रही हैं. अकेले पटना उच्च न्यायालय में जमीन संबंधी 293 पुराने मुकदमे दर्ज हैं. इन मुकदमों में 20572 एकड़ जमीन फंसी हुई है. इसी तरह रेवेन्यू बोर्ड में 76, प्रमंडलीय आयुक्तों के न्यायालय में 21, समाहर्ताओं के यहां 272, अपर समाहर्ताओं के यहां 218 तथा एसडीओ के यहां 184 मुकदमे भूमि विवाद के हैं, जो सालों से लंबित हैं. ये मुकदमे भी हजारों एकड़ जमीन के मालिकाना हक से जुड़े हैं. इन मुकदमों को तेजी से निबटाना राज्य की सिविल और राजस्व अदालतों की बड़ी चुनौती है.
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पहल
 हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी यह महसूस किया है कि देश में पांच-दस साल से भी अधिक समय से लंबित मुकदमों को तेजी से निबटाये बगैर न्याय व्यवस्था को जनहितकारी नहीं बनाया जा सकता. उसने इसके लिए सभी अदालतों को सप्ताह में एक-दो दिन केवल पुराने मुकदमों को निबटने के लिए नियत करने को कहा है, लेकिन जजों की कमी के कारण अब भी मुकदमों का बोझ कम नहीं हो रहा है.  जमानत और न्याय के लिए लाखों लोग सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं.
उच्च न्यायालय और राज्य की निचली अदालतों में जजों के अनेक पद खाली
दरअसल बिहार में त्वरित न्याय और मुकदमों के त्वरित निष्पादन की राह में कई बाधाएं हैं. पहली बाधा तो पटना उच्च न्यायालय और बिहार की निचली अदालतों में बड़ी संख्या में जजों के पदों का खाली होना है. पटना उच्च न्यायालय में न्यायाधिशों के पहले से 11 पद खाली थे. हाल में यह संख्या बढ़ कर 16 हो गयी. इसी साल अगस्त में राज्यसभा में पेश की गयी रिपोर्ट के आधार पर देखें, तो देश में उच्च न्यायालय के न्यायाधियों के सबसे ज्यादा 63 फीसदी पद पटना उच्च न्यायालय में रिक्त हैं. इलाहाबाद उच्च न्यायालय, जहां न्यायाधिशों के सबसे अधिक 160 पद हैं, वहां भी केवल 84 यानी 52.85 फीसदी पद खाली हैं. जिस बंबई हाई कोर्ट में सबसे कम मुकदमे लंबित हैं, वहां न्यायाधियों के 32 फीसदी पद खाली हैं. देश में केवल चार ऐसे उच्च न्यायालय (कर्नाटक, मेघालय, सिक्किम तथा त्रिपुरा) हैं, जहां कोई रिक्ति नहीं है. बड़ी संख्या में जजों के पदों के रिक्त रहने का का नजीता राष्ट्रीय स्तर पर दिख रहा है. मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है. यही हाल निचली अदालतों का है. निचली अदलतों में जजों की संख्या के मामले में बिहार उच्च प्रदेश (2097 पद), मप्र (2072 पद) और गुजरात (1963 पद) के बाद चौथे नंबर पर है, जहां 1670 पद स्वीकृत हैं, लेकिन पिछले साल दिसंबर में लोकसभा में पेश रिपोर्ट के मुताबिक निचली अदालतों में जजों के रिक्त पदों के मामले में बिहार गुजरात (747 रिक्त पद) के बाद दूसरे स्थान पर है, जहां 643 पद रिक्त हैं. लिहाजा गुजरात लंबित मुकदमों के मामले में भी देश भर में आगे है. बहरहाल, बिहार की निचली अदालतों और पटना उच्च न्यायालय में जब तक जजों के खाली पद तेजी ने नहीं भरे जायेंगे, तब तक त्वरित न्याय या मुकदमों के बोझ को कम करना असंभव होगा.

त्वरित न्याय के उपायों पर जजों की कमी भारी
बिहार में जमीन से जुड़े पुराने मुकदमों का बोझ अब भी बड़ा है. हाल में राज्य में भूमि विवाद में हत्या की कई घटनाएं हुई हैं. यहां तक कि एक युवक ने इसी विवाद में मां और बहन तक को मार डाला. भूमि विवाद में हत्या जैसी वारदात के पीछे उत्तेजना ही नहीं, हताशा भी बड़ी वजह है. इसे त्वरित न्याय सुलभ कराने की व्यवस्था से ही दूर किया जा सकता है. मुकदमों के बोझ को कम करने और पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाने के लिए देश में कई प्रयोग हुए हैं. फास्ट ट्रैक कोर्ट, विशेष अदालत, लोक अदालत और मुकदमा पूर्व समझौते वगैरह, लेकिन इनसे नये मुकदमों को निबटाने में भले मदद मिली है, पुराने मुकदमों का बोझ कम नहीं हुआ है. खास कर जमीन संबंधी मुकदमों का बोझ. अब भी 20-25 सालों से ऐसे मुकदमे लंबित हैं.

देश में जजों की कमी व लंबित मुकदमों की स्थिति
त्नदेश में प्रति दस लाख की आबादी पर 17 जज हैं, जबकि यह संख्या 50 होनी चाहिए.
त्नदेश  की सभी अदालतों में करीब पांच हजार (23 फीसदी) जजों की कमी है.
त्नदेश की सभी जिला एवं सत्र अदालतों में 2.5 करोड़ मुकदमे लंबित हैं.
त्नकरीब 20 लाख मुकदमे ऐसे हैं, जो दस साल भी अधिक समय से चल रहे हैं.
त्न सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और लोअर कोर्ट में जजों के सभी पद भर दिये जाएं, तो
लंबित मुकदमों का औसत प्रति जज 1,625 होगा.
                                          (लोकसभा , 31.12.2013 की रिपोर्ट  के आधार पर)

पटना उच्च न्यायालय में लंबित मुकदमे
जमानत याचिका 0.56 लाख
कुल सिविल व क्रिमिनल वाद 1.35 लाख
त्नउच्च न्यायलय, पटना में जमानत याचिकाओं का औसत प्रति न्यायाधीश 2074.
त्नसिविल व क्रिमिनल मुकदमों का औसत प्रति न्यायाधीश 5000.  

निचली अदलतों में जजों की अधिक संख्या वाले पांच राज्यों की स्थिति
राज्य कुल पद खाली रिक्त
उत्तर प्रदेश 2097 1761 336
महाराष्ट्र 2072 1784 288
गुजरात 1963 1216 747
बिहार 1670 1027 643
मध्य प्रदेश 1460 1243 217
                   स्नेत : लोकसभा, 31.12.2014

उच्च न्यायालयों में जजों के पद
उच्च न्यायालय कुल पद खाली रिक्त
इलाहाबाद 160 76 84
बंबई          94 64 30
पंजाब व हरियाणा 85 54 31
कर्नाटक 62 32 30
दिल्ली 60 40 20
मद्रास 60 38 22
कलकत्ता 58 44 14
मध्य प्रदेश 53 33 20
गुजरात 52 29 23
हैदराबाद 49 27 22
पटना 43 32 16
जम्मू-कश्मीर 27 10 7
ओड़िशा 27 22 5
झारखंड 25 14 11
गुवहाटी 24 17 7
छत्तीसगढ़ 22 9 13
हिमाचल प्रदेश 13 7 6
उत्तराखंड 11 6 5
मणीपुर 4 3 1
केरल (38), मेघालय (3),सिक्किम (3) तथा त्रिपुरा (4) उच्च न्यायालयों में न्यायाधिशों का कोई पद रिक्त नहीं.
नोट: पटना उच्च न्यायालय का आकड़ा अद्यतन स्थिति पर आधारित.
                                  स्नेत : राज्यसभा, 1 अगस्त 2015.

तेजी से बढ़ रहा पटना हाइ कोर्ट पर मुकदमों का बोझ

तेजी से बढ़ रहा पटना हाइ कोर्ट पर मुकदमों का बोझ
आरके नीरद

दो दिन पहले (15 दिसंबर) पटना उच्च न्यायालय ने हत्या के एक सजायाफ्ता व्यक्ति की जमानत याचिका पर पहले सुनायी करने के  उसके अनुरोध को ठुकरा दिया. न्यायालय ने ऐसा इसलिए किया कि सब के लिए न्याय के समान अवसर के सिद्धांत का अतिक्रमण न हो. अदालत ने यह भी टिपण्णी की कि 56 हजार जमानत याचिकाएं  पटना उच्च न्यायालय में  लंबित हैं.  विभिन्न मामलों में सजा प्राप्त हजारों लोग जमान नहीं मिलने के कारण जेलों में बंद हैं. सिविल और अपराधिक प्रकृति के 1.35 लाख मुकदमे पटना उच्च न्यायालय के समक्ष विचार के लिए पड़े हैं. यह आंकड़ा बेशक सामान्य नहीं है. बिहार के मुकाबले बंबई हाइकोर्ट का क्षेत्रधिकार बड़ा है और उसके अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या भी बिहार से ज्यादा है. फिर भी बंबई हाई कोर्ट के समक्ष अग्रिम जमानत की केवल 756 और नियमित 1000 याचिकाएं लंबित हैं. 
दरअसल बिहार में त्वरित न्याय और मुकदमों के त्वरित निष्पादन की राह में कई बाधाएं हैं. पहली बाधा तो पटना उच्च न्यायालय और बिहार की निचली अदालतों में बड़ी संख्या में जजों के पदों का खाली होना है. पटना उच्च न्यायालय में न्यायाधिशों के पहले से 11 पद खाली थे. हाल में यह संख्या बढ़ कर 16 हो गयी. इसी साल अगस्त में राज्यसभा में पेश की गयी रिपोर्ट के आधार पर देखें, तो देश में उच्च न्यायालय के न्यायाधियों के सबसे ज्यादा 63 फीसदी पद पटना उच्च न्यायालय में रिक्त हैं. इलाहाबाद उच्च न्यायालय, जहां न्यायाधिशों के सबसे अधिक 160 पद हैं, वहां भी केवल 84 यानी 52.85 फीसदी पद खाली हैं. जिस बंबई हाई कोर्ट में सबसे कम मुकदमे लंबित हैं, वहां न्यायाधियों के 32 फीसदी पद खाली हैं. देश में केवल चार ऐसे उच्च न्यायालय (कर्नाटक, मेघालय, पंजाब व हरियाणा तथा त्रिपुरा) हैं, जहां कोई रिक्ति नहीं है. बड़ी संख्या में जजों के पदों के रिक्त रहने का का नजीता राष्ट्रीय स्तर पर दिख रहा है. मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है. यही हाल निचली अदालतों का है. निचली अदलतों में जजों की संख्या के मामले में बिहार उच्च प्रदेश (2097 पद), मप्र (2072 पद) और गुजरात (1963 पद) के बाद चौथे नंबर पर है, जहां 1670 पद स्वीकृत हैं, लेकिन पिछले साल दिसंबर में लोकसभा में पेश रिपोर्ट के मुताबिक निचली अदालतों में जजों के रिक्त पदों के मामले में बिहार गुजरात (747 रिक्त पद) के बाद दूसरे स्थान पर है, जहां 643 पद रिक्त हैं. लिहाजा गुजरात लंबित मुकदमों के मामले में भी देश भर में आगे है. बहरहाल, बिहार की निचली अदालतों और पटना उच्च न्यायालय में जब तक जजों के खाली पद तेजी ने नहीं भरे जायेंगे, तब तक त्वरित न्याय या मुकदमों के बोझ को कम करना असंभव होगा.
दूसरी बाधा भूमि विवाद की समस्या है. बिहार में जमीन से जुड़े पुराने मुकदमों का बोझ अब भी बड़ा है. हाल में राज्य में भूमि विवाद में हत्या की कई घटनाएं हुई हैं. यहां तक कि एक युवक ने इसी विवाद में मां और बहन तक को मार डाला. भूमि विवाद में हत्या जैसी वारदात के पीछे उत्तेजना ही नहीं, हताशा भी बड़ी वजह है. इसे त्वरित न्याय सुलभ कराने की व्यवस्था से ही दूर किया जा सकता है. मुकदमों के बोझ को कम करने और पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाने के लिए देश में कई प्रयोग हुए हैं. फास्ट ट्रैक कोर्ट, विशेष अदालत, लोक अदालत और मुकदमा पूर्व समझौते वगैरह, लेकिन इनसे नये मुकदमों को निबटाने में भले मदद मिली है, पुराने मुकदमों का बोझ कम नहीं हुआ है. खास कर जमीन संबंधी मुकदमों का बोझ. अब भी 20-25 सालों से ऐसे मुकदमे लंबित हैं. यह न्याय के मौलिक  सिद्धांत के विपरीत है. पटना उच्च न्यायालय में करीब 1.34 लाख मुकदमे लंबित हैं. राज्य के सिविल कोर्ट में लंबित मुकदमों की बात करें, तो इनकी संख्या लगभग 19 लाख है. स्पष्ट है कि यह संख्या सामान्य नहीं है. जहां मुकदमों के इस बोझ को कम करना अदालतों के लिए बड़ी चुनौती है, वहीं इसके पक्षकारों के लिए न्याय पाना बड़े सब्र का हिस्सा. इन लंबित मुकदमों में बड़ी संख्या वैसे भूमि विवाद के हैं, जिनमें दशकों से अदालती फैसले की बजाय तारीखें मिल रही हैं. अकेले पटना उच्च न्यायालय में जमीन संबंधी 293 पुराने मुकदमे दर्ज हैं. इन मुकदमों में 20572 एकड़ जमीन फंसी हुई है. इसी तरह रेवेन्यू बोर्ड में 76, प्रमंडलीय आयुक्तों के न्यायालय में 21, समाहर्ताओं के यहां 272, अपर समाहर्ताओं के यहां 218 तथा एसडीओ के यहां 184 मुकदमे भूमि विवाद के हैं, जो सालों से लंबित हैं. ये मुकदमे भी हजारों एकड़ जमीन के मालिकाना हक से जुड़े हैं. इन मुकदमों को तेजी से निबटाना राज्य की सिविल और राजस्व अदालतों की बड़ी चुनौती है. हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी यह महसूस किया है कि देश में पांच-दस साल से भी अधिक समय से लंबित मुकदमों को तेजी से निबटाये बगैर न्याय व्यवस्था को जनहितकारी नहीं बनाया जा सकता. उसने इसके लिए सभी अदालतों को सप्ताह में एक-दो दिन केवल पुराने मुकदमों को निबटने के लिए नियत करने को कहा है. इसमें भूमि विवाद के पुराने मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निबटाने की जरूरत होगी, ताकि राज्य की एक बड़ी समस्या का हल निकल सके.  


परिचय
नाम : आरके नीरद
पेशा : पत्रकार व लेखक
संबद्ध : आकाशवाणी व दूरदर्शन, न्यूज 11, सहारा नेशनल व साधना, इन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से वर्षो तक संबद्ध. प्रभात खबर (हिंदी दैनिक) से 22 सालों से सक्रिय रूप से संबद्ध. अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेख, लघुकथाख् समीक्षा व कविताएं प्रकाशित.
सम्मान : झारखंड मीडिया फैलोशिप सहित कई सम्मान.
विशेष : ‘जनपक्षीय् पत्रकारिता और हरिवंश’ पर पीएचडी उपाधि के लिए सिदो-कान्हू मुमरूं विश्वविद्यालय, दुमका, झारखंड के अधीन शोधरत.
संप्रति : प्रभात खबर (पटना) में मुख्य उप संपादक.
संपर्क का स्थायी पता : कमलाबाग कालोनी, दुधानी, दुमका, झारखंड
मोबाईल् : 09431177865

Monday, 24 August 2015

नारों ने सत्ता दिलायी, छीनी भी

नारे और जुमले चुनाव के ऐसे पहलू हैं, जिनमें राजनीतिक दलों की सोच और काल-परिस्थिति के अक्स पूरी शिद्दत से उतारे जाते हैं. इसे चूंकि हर बार चुनावी समीकरण और सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं. इसलिए चुनावी नारे और जुमले भी बदल जाते हैं. इन नारों में समस और समाज का मिजाज भी छिपा होता है. 1977 में ‘इंदिरा हटाओ, देश बचाओ’ के नारे ने जहां केंद्र की सत्ता से कांग्रेस को उखाड़ फेंका, वहीं 1980 के चुनाव में ‘आधी रोटी खायेंगे, इंदिरा को जितायेंगे’ के नारे ने सत्ता में उसकी वापसी का रास्ता खोला. चुनावी नारों ने जनता को कुछ दिया हो या नहीं, दलों को अपने पक्ष में हवा बनाने में खूब मदद की है. इसलिए हर चुनाव में राजनीतिक पार्टियों का पहला जोर नारों पर होता है. इसमें अपनी उपलब्धियों की चर्चा, भावी कार्यक्रमों और नीतियों की घोषणा तथा विपक्ष पर हमले भी होते है.
      1971 में  इंदिरा गांधी के नारे ‘गरीबी हटाओ’ ने देश भर के गरीबों को पहली बार राजनीतिक सोच की मुख्य धारा से जोड़ा. तब ऐसा करना राजनीतिक परिस्थितियों की दृष्टि से इंदिरा गांधी की विवशता थी. तब रोटी, कपड़ा और मकान जैसे सवालों के साथ दूसरे राजनीतिक दलों तो चुनौती दे ही रहे थे, वर्चस्व के सवाल पर कांग्रेस की आंतरिक खींचतान भी कम नहीं थी.
         राजनीतिक विेषकों ने इसे इंदिरा गांधी की लेफ्ट ओरिएंटेड पॉलिसी कहा. हालांकि जल्द ही इस नारे का आकर्षण खत्म हो गया और लोगों का इससे मोहभंग हुआ. परिणाम हुआ कि कांग्रेस पर ‘गरीबी नहीं, गरीब हटाओ’ की तोहमत भरी जुमलेबाजी हुई. यही हश्र  2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नारे ‘काले धन वापस लायेंगे’ और ‘सब का साथ, सब का विकास’ का हुआ या होता दिख रहा है. चुनाव के दौरान  इन नारों ने लोगों पर खूब असर डाला, मगर चुनाव के बाद काले धन की वापसी के सवाल पर जब केंद्र सरकार घिर गयी, तब भाजपा ने ही यह कह कर इसकी हवा निकाल दी कि यह चुनावी जुमला था. भूमि अधिग्रहण बिल को संसद में पारित न करा पाने की स्थिति में  तीन-तीन बार अध्यादेश जारी कर इसे प्रभावी बनाने की भाजपा नीत सरकार की कार्रवाई ने ‘सब का साथ, सब का विकास’ के नारे पर संदेह पैदा किया. अब तो इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ की तर्ज पर इस नारे पर भी  ‘सब का साथ, खास का विकास’ की तोहमत भरी जुमलेबाजी की जाने लगी है.
एक नारा और भी बेमौत मरता दिख रहा है. वह है ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’. व्यापमं घोटाले और ललित मोदी प्रकरण में इस नारे की चमक धुलती नजर आ रही है. इन सबके बावजूद चुनाव और नारों का रिश्ता कमजोर नहीं हुआ. दरअसल चुनावी नारों का अपना समाजशास्त्रीय और यथार्थवादी पक्ष भी है. इनका सामाजिक मनोविज्ञान पर गहरा प्रभाव होता है. यह चुनाव अभियान और  कार्यकर्ताओं में जोश पैदा करता है. इसलिए इसमें आक्र ामकता का समावेश करने के भरपूर प्रयास होते रहे हैं. इस प्रयास में कई बार इस आक्रमकता ने राजनीतिक मर्यादा और सामाजिक सौहार्द पर सीधा प्रहार किया है. इसके प्रभाव भी नकारात्मक हुए हैं, लेकिन चुनावी जुनून में इसकी परवाह तब तक नहीं की गयी, जब तक कि राजनीतिक दलों को इससे नुकसान नहीं पहुंचा. बहरहाल, जोशीले नारे गढ़ने में वाम दलों को महारत हासिल रही है.

खूब हुईं नारों की जुगलबंदियां 

वाम दलों के आक्रामक और जोशीले नारे चुनाव और चुनाव के बाद भी जनमानस पर गहरी छाप छोड़ते हैं. जन मुद्दों पर गढ़े इसके नारे भी दमदार रहे हैं. एक आम आदमी भी इन नारों से खुद के जज्बातों को पूरी ताकत से प्रकट करने में सक्षम होता है. इसके नारों की आक्र ामकता को दूसरे दलों ने भी स्वीकारा और उन्होंने भी इसी तर्ज को अपनाया. जब देश आजाद हुआ और केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी, तब के सामाजिक-आर्थिक यथार्थ को केंद्र में रख कर वाम पंथियों ने नारा गढ़ा कि ‘देश की जनता भूखी है, यह आजादी झूठी है’. 
       इस नारे से समाज में गोलबंदी का राजनीतिक अभियान चला. केंद्र की सत्ता हासिल करने के लिए चुनावी नारा भी गढ़ा गया. वह था ‘लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’. 90 के दशक में भाजपा ने इसी तर्ज पर चुनावी नारा बुलंद किया था, ‘अटल- आडवाणी-कमल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’. गौर करें, तो 1990 तक चुनावी नारों की जुगलबंदी बड़ी रोचक थी. इसमें शालीनता और मर्यादा का पूरा पालन होता था. 60 के दशक में कांग्रेस के खिलाफ जनसंघ पूरी मजबूती से चुनाव मैदान में उतरा था. उसका चुनाव चिह्न् दीपक था और कांग्रेस का जोड़ा बैल. तब जनसंघ ने नारा दिया था, ‘जली झोंपड़ी-भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल’. कांग्रेस ने इसके जवाब में नारा लगाया, ‘इस दीपक में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं’. ये दोनों नारे बाद के सालों में भी लोगों के जेहन में गूंजते रहे. जनसंघ का एक और नारा नारा खूब लोकिप्रय हुआ था,
‘हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, 
हर घर में दीपक, जनसंघ की निशानी’. 
आपातकाल जनसंघ का नारा आया,
‘अटल बिहारी बोल रहा है, 
इंदिरा का शासन डोल रहा है’. 
कहते हैं कि इंदिरा जी की राय बरेली से हार में इस नारे का भी योगदान था.
 भारतीय चुनावी राजनीति में समाजवादियों ने भी अपनी पॉलिटिकल आयडियोलॉजी को आम जन तक पहुंचाने के लिए नारों का सहारा लिया. इनमें सन सत्तर के दशक में डॉ राम मनोहर लोहिया का यह नारा ‘सोशिलस्टों ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’ सबसे ज्यादा प्रभावी माना गया. इस ने समाज के पिछड़े तबके के लोगों को गोलबंद करने में बड़ी भूमिका निभायी. यह लोहिया जी के राजनीतिक दर्शन की बुनियाद थी. आपातकाल के बाद जिन नेताओं ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ा, उनमें इंदिरा मंत्रिमंडल के कृषि एवं सिंचाई मंत्री जगजीवन राम भी थे. तब बिहार में उनके समर्थकों का यह नारा भी खूब गूंजा था,
‘जगजीवन राम की आई आंधी, उड़ जायेगी इंदिरा गांधी’ और ‘आकाश से कहें नेहरू पुकार, मत कर बेटी अत्याचार.’  
       आपातकाल के बाद, 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी ने ‘इंदिरा हटाओ, देश बचाओ’ का नारा दिया. इस नारे को आपातकाल में जनता को हुई तकलीफों का समर्थन भी मिला. लिहाजा इस नारे को बड़ी आसानी से लोगों ने स्वीकार कर लिया. उन दिनों बिहार में एक और नारा गांव-शहर में गूंज रहा था. वह था ‘जमीन गयी चकबंदी में, मरद गया नसबंदी में’. यह संजय गांधी के जबरिया नसबंदी पर तीखी जन प्रतिक्रि या थी. बहरहाल, जनता पार्टी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और 1980 में मध्यावधि चुनाव हुआ.

आक्रोश का माध्यम बने नारे

आपातकाल में राजनीतिक नारे सत्ता के खिलाफ जनता के आक्रोश की अभिव्यक्ति का बड़ा माध्यम बने और राजनीतिक रूप से लोगों को जागरूक भी किया. उस समय के नारों पर गौर करें, तो उन पर साहित्य का बड़ा प्रभाव दिखता है. उस समय के साहित्यकारों ने भी आपातकाल को लेकर खूब राजनीतिक कविताएं लिखीं. उन कविताओं को सभाओं में गाया गया और उनकी पंक्तियों को नारा बनाया गया. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं की पंक्तियां तो जेपी आंदोलन के प्रांण थीं, लेकिन 1977 में बनी जनता सरकार पांच साल पूरा नहीं कर सकी ओर 1980 में मध्याविध चुनाव हुआ. इस सरकार के ढ़ाई साल के कार्यकाल में जनता को हुई परेशानियों को कांग्रेस ने मुद्दा बनाया, मगर उसने  नकारात्मक की जगह सकारात्मक नारे गढ़े. इनमें सबसे चर्चित और राजनीतिक दृष्टि से दूरगामी प्रभाव वाला नारा था ‘आधी रोटर खायेंगे, इंदिरा को जितायेंगे’. इस नारे ने देश को राजनीतिक विकल्प दिया गया. इसमें जनता पार्टी सरकार की विफलता का नैराश्य भी था, लेकिन दृष्टि सकारात्मक थी. इस सकारात्मक नारे ने सत्ता में इंदिरा जी की वापसी करायी. कांग्रेस को 351 सीटें मिलीं. इसी चुनाव से ‘स्थिर सरकार’ चुनावी मुद्दा बना. जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल पूरा न कर पाने को आधार बना कर कांग्रेस ने एक और सकारात्मक नारा दिया था, जो आज भी देश-राज्यों के चुनावों में बड़ा मुद्दा बन रहा है. यह नारा था, ‘चुनिए उन्हें जो सरकार चला सकें’.
इससे पहले, इंदिरा गांधी जब रायबरेली का चुनाव हारने के बाद चिकमंगलूर से उपचुनाव लड़ीं, तब कांग्रेस ने यह नारा दिया था,
‘एक शेरनी सौ लंगूर,
 चिकमंगलूर, भाई चिकमंगलूर’. 
इस चुनाव में उन्हें जीत मिली थी. 1984 में देश की राजनीतिक परिस्थिति फिर बदली. इंदिरा जी की हत्या हो गयी. कांग्रेस ने उससे उपजी सहानुभूति को बटोरने के लिए पूरे जोश से नारा लगाया ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा जी का नाम रहेगा’. इस नारे ने कांग्रेस को भारी जीत दिलायी. 1984-85 में हुए आठवीं लोकसभा चुनाव में इस नारे के साथ-साथ राजीव गांधी के समर्थन में गढ़े गये नारे ‘उठे करोड़ों हाथ हैं, राजीव जी के साथ हैं’ ने भी कांग्रेस को भरपूर ताकत दी और 409 सीटों पर इसे कामयाबी मिली. इसे कांग्रेस का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कहा गया. राष्ट्रीय विपक्षी पर्टियों का ऐसा सफाया हुआ कि लोकसभा में प्रतिपक्ष मुख्य विपक्षी पार्टी  तेलुगुदेशम पार्टी बनी. उसे 30 सीटें मिलीं थीं, लेकिन बोफोर्स कांड और पंजाब में आतंकवाद जैसे घरेलू मुद्दों ने राजीव गांधी को अलोकप्रिय बना दिया. लिहाजा 1989 के चुनाव में विपक्ष के पास कई जोशीले और धारदार नारे थे. इनमें विश्वनाथ प्रसाद प्रताप सिंह के लिए लगाया गया नारा ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’ ज्यादा चर्चित रहा.  विश्वनाथ प्रताप सिंह को बोफोर्स सौदे की अंदर की जानकारी रखने के कारण राजीव मंत्रिमंडल से बरखास्त किया गया था. उन्होंने इस सौदे को लेकर देश भर में राजनीतिक तूफान पैदा किया. हालांकि वह करीब 11 माह ही प्रधानमंत्री रह पाये. इस बीच दो बड़ी घटनाएं हुईं, जिसने देश की राजनीति, चुनाव और चुनावी नारों की दिशा बदल दी. एक घटना थी मंडल कमीशन की सिफारिशों का सार्वजनिक होना और दूसरा लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्र.

खूब काटी गयी नारों की फसल

चुनाव में नारों का प्रयोग और प्रभाव 1990 के बाद भी कायम रहा. 1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सहानुभूति वोट बटोरने में नारे ने बड़ी मदद की थी. उस साल राजीव गांधी की हत्या चुनाव के दौरान ही हुई थी. उनकी हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. इसे आतंकवाद के खिलाफ उनकी शहादत के रूप में स्थापित किया गया. कांग्रेस ने नारा दिया  ‘राजीव तेरा ये बलिदान, याद करेगा हिंदुस्तान’. इस नारे की बदौलत उसने उस चुनाव में सबसे ज्यादा 232 सीटें पायीं. हालांकि इस चुनाव परिणाम ने लोकसभा को त्रिशंकु ही बनाया था. स्पष्ट बहुमत किसी दल को नहीं था.
नारा गढ़ने और उसकी फसल काटने में भाजपा भी पीछे नहीं रही. अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करने के बाद उसने नारा दिया ‘अबकी बारी, अटल बिहारी’. भाजपा की सरकार जब एक बार सत्ता में आये, तो उसके लिए दुबारा जमीन तैयार की गयी. तब नारा दिया ‘कहो दिल से, अटल बिहारी फिर से’. इस नारे को पिछले साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपने नेता अरविंद केजरीवाल के नाम को केंद्र में रख कर आम आदमी पार्टी ने खूब भुनाया. यानी नारे किसी दल के नहीं रहे. चुनावों में नारे दलों के बीच लुढ़के भी रहे. जैसे 1960 के दशक में वाम दलों के केंद्र की सत्ता पर कब्जा करने के लिए गढ़े गये नारे ‘लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’ को 1990 के दशक में भाजपा ने अपनाया. उसने अपने दो नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को आगे कर लोकसभा की चुनावी यात्र की. तब उसने वाम दलों के इसी नारे को आधार बना कर अपना नारा दिया ‘अटल- आडवाणी-कमल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’.
बहरहाल, चुनावी नारे गढ़ने में माहिर भाजपा को उसके एक नारे ने उसे बड़ा नुकसान पहुंचाया. वह था ‘इंडिया शाइनिंग’.  इस नारे का हिंदी अनुवाद भी गढ़ा गया. वह था ‘भारत उदय’. यह नारा फ्लॉप ही नहीं रहा, इस ने एनडीए की चमक भी धो दी. इस ने लोकसभा चुनाव में भाजपा से गद्दी छीन ली. 1990 के बाद के बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों में राम मंदिर एक था. इसे लेकर भी भाजपा और उसकी आनुशांगिक इकाइयों ने कई नारे गढ़े, जिन्होंने सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में एक आंदोलन जैसी भावना पैदा की. हालांकि ये सीधे तौर पर चुनावी नारे नहीं  थे, लेकिन चुनाव पर इनका असर पड़ा. ये नारे थे ‘सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनायेंगे’, ‘अयोध्या तो पहली झांकी है, काशी मथुरा बाकी’ और ‘जय श्रीराम’. 
1990 के बाद, खास तौर पर मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के बाद कुछ ऐसे जातिवादी नारे भी गढ़े गये, तो सीधे तौर पर चुनावी नहीं थे, मगर परोक्ष रूप से चुनावों पर उनका भी असर पड़ा. बाद के सालों में विकास भी चुनाव का मुद्दा बना. खास कर नीतीश कुमार सरकार के आने के बाद. इनमें जदयू का यह नारा खूब सुना गया, ‘बोल रहा है टीवी-अखबार, सबसे आगे नीतीश कुमार’. इस चुनाव में भी उसके नारे खूब गूंज रहे हैं. इनमें ‘बढ़ता बिहार’, ‘अब बढ़ चला बिहार’, ‘बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो’, ‘नीतीशे को जिताये हैं, नीतीशे को जितायेंगे’ वगैरह. इस सदी में बिहार को लेकर भाजपा के भी नारे विकास पर केंद्रित रहे. जैसे ‘अपना वोट विकास को’, ‘बढ़ता बिहार, बनता बिहार’, ‘पांच साल, बिहार खुशहाल’ आदि.

प्रकाशित : प्रभात खबर, 11 से 22 अगस्त 15, चार किस्तों में.