तेजी से बढ़ रहा पटना हाइ कोर्ट पर मुकदमों का बोझ
आरके नीरद
दो दिन पहले (15 दिसंबर) पटना उच्च न्यायालय ने हत्या के एक सजायाफ्ता व्यक्ति की जमानत याचिका पर पहले सुनायी करने के उसके अनुरोध को ठुकरा दिया. न्यायालय ने ऐसा इसलिए किया कि सब के लिए न्याय के समान अवसर के सिद्धांत का अतिक्रमण न हो. अदालत ने यह भी टिपण्णी की कि 56 हजार जमानत याचिकाएं पटना उच्च न्यायालय में लंबित हैं. विभिन्न मामलों में सजा प्राप्त हजारों लोग जमान नहीं मिलने के कारण जेलों में बंद हैं. सिविल और अपराधिक प्रकृति के 1.35 लाख मुकदमे पटना उच्च न्यायालय के समक्ष विचार के लिए पड़े हैं. यह आंकड़ा बेशक सामान्य नहीं है. बिहार के मुकाबले बंबई हाइकोर्ट का क्षेत्रधिकार बड़ा है और उसके अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या भी बिहार से ज्यादा है. फिर भी बंबई हाई कोर्ट के समक्ष अग्रिम जमानत की केवल 756 और नियमित 1000 याचिकाएं लंबित हैं.
दरअसल बिहार में त्वरित न्याय और मुकदमों के त्वरित निष्पादन की राह में कई बाधाएं हैं. पहली बाधा तो पटना उच्च न्यायालय और बिहार की निचली अदालतों में बड़ी संख्या में जजों के पदों का खाली होना है. पटना उच्च न्यायालय में न्यायाधिशों के पहले से 11 पद खाली थे. हाल में यह संख्या बढ़ कर 16 हो गयी. इसी साल अगस्त में राज्यसभा में पेश की गयी रिपोर्ट के आधार पर देखें, तो देश में उच्च न्यायालय के न्यायाधियों के सबसे ज्यादा 63 फीसदी पद पटना उच्च न्यायालय में रिक्त हैं. इलाहाबाद उच्च न्यायालय, जहां न्यायाधिशों के सबसे अधिक 160 पद हैं, वहां भी केवल 84 यानी 52.85 फीसदी पद खाली हैं. जिस बंबई हाई कोर्ट में सबसे कम मुकदमे लंबित हैं, वहां न्यायाधियों के 32 फीसदी पद खाली हैं. देश में केवल चार ऐसे उच्च न्यायालय (कर्नाटक, मेघालय, पंजाब व हरियाणा तथा त्रिपुरा) हैं, जहां कोई रिक्ति नहीं है. बड़ी संख्या में जजों के पदों के रिक्त रहने का का नजीता राष्ट्रीय स्तर पर दिख रहा है. मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है. यही हाल निचली अदालतों का है. निचली अदलतों में जजों की संख्या के मामले में बिहार उच्च प्रदेश (2097 पद), मप्र (2072 पद) और गुजरात (1963 पद) के बाद चौथे नंबर पर है, जहां 1670 पद स्वीकृत हैं, लेकिन पिछले साल दिसंबर में लोकसभा में पेश रिपोर्ट के मुताबिक निचली अदालतों में जजों के रिक्त पदों के मामले में बिहार गुजरात (747 रिक्त पद) के बाद दूसरे स्थान पर है, जहां 643 पद रिक्त हैं. लिहाजा गुजरात लंबित मुकदमों के मामले में भी देश भर में आगे है. बहरहाल, बिहार की निचली अदालतों और पटना उच्च न्यायालय में जब तक जजों के खाली पद तेजी ने नहीं भरे जायेंगे, तब तक त्वरित न्याय या मुकदमों के बोझ को कम करना असंभव होगा.
दूसरी बाधा भूमि विवाद की समस्या है. बिहार में जमीन से जुड़े पुराने मुकदमों का बोझ अब भी बड़ा है. हाल में राज्य में भूमि विवाद में हत्या की कई घटनाएं हुई हैं. यहां तक कि एक युवक ने इसी विवाद में मां और बहन तक को मार डाला. भूमि विवाद में हत्या जैसी वारदात के पीछे उत्तेजना ही नहीं, हताशा भी बड़ी वजह है. इसे त्वरित न्याय सुलभ कराने की व्यवस्था से ही दूर किया जा सकता है. मुकदमों के बोझ को कम करने और पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाने के लिए देश में कई प्रयोग हुए हैं. फास्ट ट्रैक कोर्ट, विशेष अदालत, लोक अदालत और मुकदमा पूर्व समझौते वगैरह, लेकिन इनसे नये मुकदमों को निबटाने में भले मदद मिली है, पुराने मुकदमों का बोझ कम नहीं हुआ है. खास कर जमीन संबंधी मुकदमों का बोझ. अब भी 20-25 सालों से ऐसे मुकदमे लंबित हैं. यह न्याय के मौलिक सिद्धांत के विपरीत है. पटना उच्च न्यायालय में करीब 1.34 लाख मुकदमे लंबित हैं. राज्य के सिविल कोर्ट में लंबित मुकदमों की बात करें, तो इनकी संख्या लगभग 19 लाख है. स्पष्ट है कि यह संख्या सामान्य नहीं है. जहां मुकदमों के इस बोझ को कम करना अदालतों के लिए बड़ी चुनौती है, वहीं इसके पक्षकारों के लिए न्याय पाना बड़े सब्र का हिस्सा. इन लंबित मुकदमों में बड़ी संख्या वैसे भूमि विवाद के हैं, जिनमें दशकों से अदालती फैसले की बजाय तारीखें मिल रही हैं. अकेले पटना उच्च न्यायालय में जमीन संबंधी 293 पुराने मुकदमे दर्ज हैं. इन मुकदमों में 20572 एकड़ जमीन फंसी हुई है. इसी तरह रेवेन्यू बोर्ड में 76, प्रमंडलीय आयुक्तों के न्यायालय में 21, समाहर्ताओं के यहां 272, अपर समाहर्ताओं के यहां 218 तथा एसडीओ के यहां 184 मुकदमे भूमि विवाद के हैं, जो सालों से लंबित हैं. ये मुकदमे भी हजारों एकड़ जमीन के मालिकाना हक से जुड़े हैं. इन मुकदमों को तेजी से निबटाना राज्य की सिविल और राजस्व अदालतों की बड़ी चुनौती है. हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी यह महसूस किया है कि देश में पांच-दस साल से भी अधिक समय से लंबित मुकदमों को तेजी से निबटाये बगैर न्याय व्यवस्था को जनहितकारी नहीं बनाया जा सकता. उसने इसके लिए सभी अदालतों को सप्ताह में एक-दो दिन केवल पुराने मुकदमों को निबटने के लिए नियत करने को कहा है. इसमें भूमि विवाद के पुराने मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निबटाने की जरूरत होगी, ताकि राज्य की एक बड़ी समस्या का हल निकल सके.
परिचय
नाम : आरके नीरद
पेशा : पत्रकार व लेखक
संबद्ध : आकाशवाणी व दूरदर्शन, न्यूज 11, सहारा नेशनल व साधना, इन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से वर्षो तक संबद्ध. प्रभात खबर (हिंदी दैनिक) से 22 सालों से सक्रिय रूप से संबद्ध. अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेख, लघुकथाख् समीक्षा व कविताएं प्रकाशित.
सम्मान : झारखंड मीडिया फैलोशिप सहित कई सम्मान.
विशेष : ‘जनपक्षीय् पत्रकारिता और हरिवंश’ पर पीएचडी उपाधि के लिए सिदो-कान्हू मुमरूं विश्वविद्यालय, दुमका, झारखंड के अधीन शोधरत.
संप्रति : प्रभात खबर (पटना) में मुख्य उप संपादक.
संपर्क का स्थायी पता : कमलाबाग कालोनी, दुधानी, दुमका, झारखंड
मोबाईल् : 09431177865
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