Monday, 24 August 2015

नारों ने सत्ता दिलायी, छीनी भी

नारे और जुमले चुनाव के ऐसे पहलू हैं, जिनमें राजनीतिक दलों की सोच और काल-परिस्थिति के अक्स पूरी शिद्दत से उतारे जाते हैं. इसे चूंकि हर बार चुनावी समीकरण और सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं. इसलिए चुनावी नारे और जुमले भी बदल जाते हैं. इन नारों में समस और समाज का मिजाज भी छिपा होता है. 1977 में ‘इंदिरा हटाओ, देश बचाओ’ के नारे ने जहां केंद्र की सत्ता से कांग्रेस को उखाड़ फेंका, वहीं 1980 के चुनाव में ‘आधी रोटी खायेंगे, इंदिरा को जितायेंगे’ के नारे ने सत्ता में उसकी वापसी का रास्ता खोला. चुनावी नारों ने जनता को कुछ दिया हो या नहीं, दलों को अपने पक्ष में हवा बनाने में खूब मदद की है. इसलिए हर चुनाव में राजनीतिक पार्टियों का पहला जोर नारों पर होता है. इसमें अपनी उपलब्धियों की चर्चा, भावी कार्यक्रमों और नीतियों की घोषणा तथा विपक्ष पर हमले भी होते है.
      1971 में  इंदिरा गांधी के नारे ‘गरीबी हटाओ’ ने देश भर के गरीबों को पहली बार राजनीतिक सोच की मुख्य धारा से जोड़ा. तब ऐसा करना राजनीतिक परिस्थितियों की दृष्टि से इंदिरा गांधी की विवशता थी. तब रोटी, कपड़ा और मकान जैसे सवालों के साथ दूसरे राजनीतिक दलों तो चुनौती दे ही रहे थे, वर्चस्व के सवाल पर कांग्रेस की आंतरिक खींचतान भी कम नहीं थी.
         राजनीतिक विेषकों ने इसे इंदिरा गांधी की लेफ्ट ओरिएंटेड पॉलिसी कहा. हालांकि जल्द ही इस नारे का आकर्षण खत्म हो गया और लोगों का इससे मोहभंग हुआ. परिणाम हुआ कि कांग्रेस पर ‘गरीबी नहीं, गरीब हटाओ’ की तोहमत भरी जुमलेबाजी हुई. यही हश्र  2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नारे ‘काले धन वापस लायेंगे’ और ‘सब का साथ, सब का विकास’ का हुआ या होता दिख रहा है. चुनाव के दौरान  इन नारों ने लोगों पर खूब असर डाला, मगर चुनाव के बाद काले धन की वापसी के सवाल पर जब केंद्र सरकार घिर गयी, तब भाजपा ने ही यह कह कर इसकी हवा निकाल दी कि यह चुनावी जुमला था. भूमि अधिग्रहण बिल को संसद में पारित न करा पाने की स्थिति में  तीन-तीन बार अध्यादेश जारी कर इसे प्रभावी बनाने की भाजपा नीत सरकार की कार्रवाई ने ‘सब का साथ, सब का विकास’ के नारे पर संदेह पैदा किया. अब तो इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ की तर्ज पर इस नारे पर भी  ‘सब का साथ, खास का विकास’ की तोहमत भरी जुमलेबाजी की जाने लगी है.
एक नारा और भी बेमौत मरता दिख रहा है. वह है ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’. व्यापमं घोटाले और ललित मोदी प्रकरण में इस नारे की चमक धुलती नजर आ रही है. इन सबके बावजूद चुनाव और नारों का रिश्ता कमजोर नहीं हुआ. दरअसल चुनावी नारों का अपना समाजशास्त्रीय और यथार्थवादी पक्ष भी है. इनका सामाजिक मनोविज्ञान पर गहरा प्रभाव होता है. यह चुनाव अभियान और  कार्यकर्ताओं में जोश पैदा करता है. इसलिए इसमें आक्र ामकता का समावेश करने के भरपूर प्रयास होते रहे हैं. इस प्रयास में कई बार इस आक्रमकता ने राजनीतिक मर्यादा और सामाजिक सौहार्द पर सीधा प्रहार किया है. इसके प्रभाव भी नकारात्मक हुए हैं, लेकिन चुनावी जुनून में इसकी परवाह तब तक नहीं की गयी, जब तक कि राजनीतिक दलों को इससे नुकसान नहीं पहुंचा. बहरहाल, जोशीले नारे गढ़ने में वाम दलों को महारत हासिल रही है.

खूब हुईं नारों की जुगलबंदियां 

वाम दलों के आक्रामक और जोशीले नारे चुनाव और चुनाव के बाद भी जनमानस पर गहरी छाप छोड़ते हैं. जन मुद्दों पर गढ़े इसके नारे भी दमदार रहे हैं. एक आम आदमी भी इन नारों से खुद के जज्बातों को पूरी ताकत से प्रकट करने में सक्षम होता है. इसके नारों की आक्र ामकता को दूसरे दलों ने भी स्वीकारा और उन्होंने भी इसी तर्ज को अपनाया. जब देश आजाद हुआ और केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी, तब के सामाजिक-आर्थिक यथार्थ को केंद्र में रख कर वाम पंथियों ने नारा गढ़ा कि ‘देश की जनता भूखी है, यह आजादी झूठी है’. 
       इस नारे से समाज में गोलबंदी का राजनीतिक अभियान चला. केंद्र की सत्ता हासिल करने के लिए चुनावी नारा भी गढ़ा गया. वह था ‘लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’. 90 के दशक में भाजपा ने इसी तर्ज पर चुनावी नारा बुलंद किया था, ‘अटल- आडवाणी-कमल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’. गौर करें, तो 1990 तक चुनावी नारों की जुगलबंदी बड़ी रोचक थी. इसमें शालीनता और मर्यादा का पूरा पालन होता था. 60 के दशक में कांग्रेस के खिलाफ जनसंघ पूरी मजबूती से चुनाव मैदान में उतरा था. उसका चुनाव चिह्न् दीपक था और कांग्रेस का जोड़ा बैल. तब जनसंघ ने नारा दिया था, ‘जली झोंपड़ी-भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल’. कांग्रेस ने इसके जवाब में नारा लगाया, ‘इस दीपक में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं’. ये दोनों नारे बाद के सालों में भी लोगों के जेहन में गूंजते रहे. जनसंघ का एक और नारा नारा खूब लोकिप्रय हुआ था,
‘हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, 
हर घर में दीपक, जनसंघ की निशानी’. 
आपातकाल जनसंघ का नारा आया,
‘अटल बिहारी बोल रहा है, 
इंदिरा का शासन डोल रहा है’. 
कहते हैं कि इंदिरा जी की राय बरेली से हार में इस नारे का भी योगदान था.
 भारतीय चुनावी राजनीति में समाजवादियों ने भी अपनी पॉलिटिकल आयडियोलॉजी को आम जन तक पहुंचाने के लिए नारों का सहारा लिया. इनमें सन सत्तर के दशक में डॉ राम मनोहर लोहिया का यह नारा ‘सोशिलस्टों ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’ सबसे ज्यादा प्रभावी माना गया. इस ने समाज के पिछड़े तबके के लोगों को गोलबंद करने में बड़ी भूमिका निभायी. यह लोहिया जी के राजनीतिक दर्शन की बुनियाद थी. आपातकाल के बाद जिन नेताओं ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ा, उनमें इंदिरा मंत्रिमंडल के कृषि एवं सिंचाई मंत्री जगजीवन राम भी थे. तब बिहार में उनके समर्थकों का यह नारा भी खूब गूंजा था,
‘जगजीवन राम की आई आंधी, उड़ जायेगी इंदिरा गांधी’ और ‘आकाश से कहें नेहरू पुकार, मत कर बेटी अत्याचार.’  
       आपातकाल के बाद, 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी ने ‘इंदिरा हटाओ, देश बचाओ’ का नारा दिया. इस नारे को आपातकाल में जनता को हुई तकलीफों का समर्थन भी मिला. लिहाजा इस नारे को बड़ी आसानी से लोगों ने स्वीकार कर लिया. उन दिनों बिहार में एक और नारा गांव-शहर में गूंज रहा था. वह था ‘जमीन गयी चकबंदी में, मरद गया नसबंदी में’. यह संजय गांधी के जबरिया नसबंदी पर तीखी जन प्रतिक्रि या थी. बहरहाल, जनता पार्टी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और 1980 में मध्यावधि चुनाव हुआ.

आक्रोश का माध्यम बने नारे

आपातकाल में राजनीतिक नारे सत्ता के खिलाफ जनता के आक्रोश की अभिव्यक्ति का बड़ा माध्यम बने और राजनीतिक रूप से लोगों को जागरूक भी किया. उस समय के नारों पर गौर करें, तो उन पर साहित्य का बड़ा प्रभाव दिखता है. उस समय के साहित्यकारों ने भी आपातकाल को लेकर खूब राजनीतिक कविताएं लिखीं. उन कविताओं को सभाओं में गाया गया और उनकी पंक्तियों को नारा बनाया गया. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं की पंक्तियां तो जेपी आंदोलन के प्रांण थीं, लेकिन 1977 में बनी जनता सरकार पांच साल पूरा नहीं कर सकी ओर 1980 में मध्याविध चुनाव हुआ. इस सरकार के ढ़ाई साल के कार्यकाल में जनता को हुई परेशानियों को कांग्रेस ने मुद्दा बनाया, मगर उसने  नकारात्मक की जगह सकारात्मक नारे गढ़े. इनमें सबसे चर्चित और राजनीतिक दृष्टि से दूरगामी प्रभाव वाला नारा था ‘आधी रोटर खायेंगे, इंदिरा को जितायेंगे’. इस नारे ने देश को राजनीतिक विकल्प दिया गया. इसमें जनता पार्टी सरकार की विफलता का नैराश्य भी था, लेकिन दृष्टि सकारात्मक थी. इस सकारात्मक नारे ने सत्ता में इंदिरा जी की वापसी करायी. कांग्रेस को 351 सीटें मिलीं. इसी चुनाव से ‘स्थिर सरकार’ चुनावी मुद्दा बना. जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल पूरा न कर पाने को आधार बना कर कांग्रेस ने एक और सकारात्मक नारा दिया था, जो आज भी देश-राज्यों के चुनावों में बड़ा मुद्दा बन रहा है. यह नारा था, ‘चुनिए उन्हें जो सरकार चला सकें’.
इससे पहले, इंदिरा गांधी जब रायबरेली का चुनाव हारने के बाद चिकमंगलूर से उपचुनाव लड़ीं, तब कांग्रेस ने यह नारा दिया था,
‘एक शेरनी सौ लंगूर,
 चिकमंगलूर, भाई चिकमंगलूर’. 
इस चुनाव में उन्हें जीत मिली थी. 1984 में देश की राजनीतिक परिस्थिति फिर बदली. इंदिरा जी की हत्या हो गयी. कांग्रेस ने उससे उपजी सहानुभूति को बटोरने के लिए पूरे जोश से नारा लगाया ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा जी का नाम रहेगा’. इस नारे ने कांग्रेस को भारी जीत दिलायी. 1984-85 में हुए आठवीं लोकसभा चुनाव में इस नारे के साथ-साथ राजीव गांधी के समर्थन में गढ़े गये नारे ‘उठे करोड़ों हाथ हैं, राजीव जी के साथ हैं’ ने भी कांग्रेस को भरपूर ताकत दी और 409 सीटों पर इसे कामयाबी मिली. इसे कांग्रेस का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कहा गया. राष्ट्रीय विपक्षी पर्टियों का ऐसा सफाया हुआ कि लोकसभा में प्रतिपक्ष मुख्य विपक्षी पार्टी  तेलुगुदेशम पार्टी बनी. उसे 30 सीटें मिलीं थीं, लेकिन बोफोर्स कांड और पंजाब में आतंकवाद जैसे घरेलू मुद्दों ने राजीव गांधी को अलोकप्रिय बना दिया. लिहाजा 1989 के चुनाव में विपक्ष के पास कई जोशीले और धारदार नारे थे. इनमें विश्वनाथ प्रसाद प्रताप सिंह के लिए लगाया गया नारा ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’ ज्यादा चर्चित रहा.  विश्वनाथ प्रताप सिंह को बोफोर्स सौदे की अंदर की जानकारी रखने के कारण राजीव मंत्रिमंडल से बरखास्त किया गया था. उन्होंने इस सौदे को लेकर देश भर में राजनीतिक तूफान पैदा किया. हालांकि वह करीब 11 माह ही प्रधानमंत्री रह पाये. इस बीच दो बड़ी घटनाएं हुईं, जिसने देश की राजनीति, चुनाव और चुनावी नारों की दिशा बदल दी. एक घटना थी मंडल कमीशन की सिफारिशों का सार्वजनिक होना और दूसरा लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्र.

खूब काटी गयी नारों की फसल

चुनाव में नारों का प्रयोग और प्रभाव 1990 के बाद भी कायम रहा. 1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सहानुभूति वोट बटोरने में नारे ने बड़ी मदद की थी. उस साल राजीव गांधी की हत्या चुनाव के दौरान ही हुई थी. उनकी हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. इसे आतंकवाद के खिलाफ उनकी शहादत के रूप में स्थापित किया गया. कांग्रेस ने नारा दिया  ‘राजीव तेरा ये बलिदान, याद करेगा हिंदुस्तान’. इस नारे की बदौलत उसने उस चुनाव में सबसे ज्यादा 232 सीटें पायीं. हालांकि इस चुनाव परिणाम ने लोकसभा को त्रिशंकु ही बनाया था. स्पष्ट बहुमत किसी दल को नहीं था.
नारा गढ़ने और उसकी फसल काटने में भाजपा भी पीछे नहीं रही. अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करने के बाद उसने नारा दिया ‘अबकी बारी, अटल बिहारी’. भाजपा की सरकार जब एक बार सत्ता में आये, तो उसके लिए दुबारा जमीन तैयार की गयी. तब नारा दिया ‘कहो दिल से, अटल बिहारी फिर से’. इस नारे को पिछले साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपने नेता अरविंद केजरीवाल के नाम को केंद्र में रख कर आम आदमी पार्टी ने खूब भुनाया. यानी नारे किसी दल के नहीं रहे. चुनावों में नारे दलों के बीच लुढ़के भी रहे. जैसे 1960 के दशक में वाम दलों के केंद्र की सत्ता पर कब्जा करने के लिए गढ़े गये नारे ‘लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’ को 1990 के दशक में भाजपा ने अपनाया. उसने अपने दो नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को आगे कर लोकसभा की चुनावी यात्र की. तब उसने वाम दलों के इसी नारे को आधार बना कर अपना नारा दिया ‘अटल- आडवाणी-कमल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’.
बहरहाल, चुनावी नारे गढ़ने में माहिर भाजपा को उसके एक नारे ने उसे बड़ा नुकसान पहुंचाया. वह था ‘इंडिया शाइनिंग’.  इस नारे का हिंदी अनुवाद भी गढ़ा गया. वह था ‘भारत उदय’. यह नारा फ्लॉप ही नहीं रहा, इस ने एनडीए की चमक भी धो दी. इस ने लोकसभा चुनाव में भाजपा से गद्दी छीन ली. 1990 के बाद के बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों में राम मंदिर एक था. इसे लेकर भी भाजपा और उसकी आनुशांगिक इकाइयों ने कई नारे गढ़े, जिन्होंने सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में एक आंदोलन जैसी भावना पैदा की. हालांकि ये सीधे तौर पर चुनावी नारे नहीं  थे, लेकिन चुनाव पर इनका असर पड़ा. ये नारे थे ‘सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनायेंगे’, ‘अयोध्या तो पहली झांकी है, काशी मथुरा बाकी’ और ‘जय श्रीराम’. 
1990 के बाद, खास तौर पर मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के बाद कुछ ऐसे जातिवादी नारे भी गढ़े गये, तो सीधे तौर पर चुनावी नहीं थे, मगर परोक्ष रूप से चुनावों पर उनका भी असर पड़ा. बाद के सालों में विकास भी चुनाव का मुद्दा बना. खास कर नीतीश कुमार सरकार के आने के बाद. इनमें जदयू का यह नारा खूब सुना गया, ‘बोल रहा है टीवी-अखबार, सबसे आगे नीतीश कुमार’. इस चुनाव में भी उसके नारे खूब गूंज रहे हैं. इनमें ‘बढ़ता बिहार’, ‘अब बढ़ चला बिहार’, ‘बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो’, ‘नीतीशे को जिताये हैं, नीतीशे को जितायेंगे’ वगैरह. इस सदी में बिहार को लेकर भाजपा के भी नारे विकास पर केंद्रित रहे. जैसे ‘अपना वोट विकास को’, ‘बढ़ता बिहार, बनता बिहार’, ‘पांच साल, बिहार खुशहाल’ आदि.

प्रकाशित : प्रभात खबर, 11 से 22 अगस्त 15, चार किस्तों में.

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