Monday, 24 August 2015

कूकर की सीटी – आर०के० नीरद (मुख्य उप संपादक पंचायतामा ,प्रभात खबर)

एक साल दस दिन होटल में खाना खाने के बाद मैं पक्के तौर पर यह बता सकता हूं कि वजन घटाने और मोटापा दूर करने की इससे अचूक विधा कोई और नहीं. लिहाजा जब पूरी तरह हल्का और चीपटा हो गया, तब तय किया कि अब चाहे जैसे भी हो, खुद खाना पकाऊंगा और खाऊंगा. इस संकल्प को पूरा करने में भले थोड़ा वक्त लगा, मगर अंतत: खाना बनना शुरू हो गया. पहली रात हलुआ बना. लाजवाब. ऐसा हलुआ आपने कम-से-कम देखा तो नहीं होगा. देखा मैंने भी नहीं था. चखने पर यकीन हुआ हलुआ ही है. मन मिठास से और पेट हलुए से भर गया. रात भर बड़ी अच्छी नींद आयी. नींद में भी हलुआ आया. पूड़ी आयी. दाल, भात और तरकारी आये. पूरी रात बड़ी मस्त बीती.
सुबह जो कुछ बनाना-खाना था, वह बनाया-खाया. बारी आयी रात की. अखबार के दफ्तर में नौकरी का एक बड़ा फयादा है. जब शहर सो रहा होता है, तब आप घर लौट रहे होते हैं. आप पैदल लौट रहे हैं या किसी सवारी-ववारी से, यह कोई नहीं देखता. सड़कों की रखवाली करने वाले कुत्ते भी कुछ ही दिनों में आपको पहचान लेते हैं. पहचान ऐसी बन जाती है कि  आपको देखकर भौंकने-गुर्राने की औपचारिकता भी नहीं रह जाती है. यानी कोई टोका-टोकी करने वाला भी नहीं होता. कभी-कभी ऐसा होता है कि आप दफ्तार से सोमवार की रात निकलते हैं. किलो-दो किलोमीटर दूर अपने घर पहुंचते हैं, तो मंगलवार हो चुका होता है. यानी एक पैर सोमवार में और दूसरा मंगलवार में. इस जीवन को जीने का अपना ही सुख है, जिस पर लाख दलील देने और कसमें खाने के बाद भी कोई भला आदमी यकीन नहीं कर सकता. वह आपसे सहानुभूति रख सकते हैं, मगर आपके इस सुख की गवाही नहीं दे सकता.
बरहाल, ऐसे ही सुख को जीता हुआ जब मैं घर पहुंचा, तो दिन और तारीख दोनों एक-एक डेग आगे खिसक चुके थे. पूरा मुहल्ला ऐसी खामोशी में लिपटा-सिमटा था, जैसे शहर का कोई कोना न होकर मैच खत्म होने के बाद का क्रिकेट मैदान हो. पिछली रात के हलुए शक्ल  अब भी दिलो-दिमाग पर छायी थी. सो, चूल्हे पर कूकर रख कर भात बनाने को जी आया. कुछ देर बाद कूकर ने जोर की सीटी मारी, तो रात थर्रा उठी. मुहल्ले की नि:शब्दता कांपने लगी. वह ही एक नहीं, तीन-तीन बार!
इसका असर सुबह पता चला. हमारे पड़ोसी कामेश्वर जी को सबेरे-सबेरे ट्रेन पकड़नी थी. कूकर की सीटी सुनी, तो हड़बड़ा कर जागे और सीधा बाथरूम भागे. लगा दिन निकल आया है और ट्रेन छूट गयी है. रूप्पन की दादी ने बिस्तर छोड़ दिया और ठंड की परवाह किये बिना अपनी आदत के मुताबिक नहा-धुआ कर अपने कान्हा जी को जगाने जा पहुंचीं. गुप्ता जी की बेटी इस साल इंटर का इंतहान देगी. झटपट उठी और मनोविज्ञान के सवालों को याद करने बैठ गयी. उसका संकल्प था, घंटे भर बाद जब तक मां जगेगी, तब तक वह दो सवालों के जवाब याद कर चुकी होगी, मगर दो घंटे बाद भी जब कहीं से खटर-पटर की कोई आवाज नहीं आयी, तो उसे ताज्जुब हुआ. घड़ी देखी. ढ़ाई बज रहे थे. दूसरी घड़ी देखी. पहली घड़ी से कुछ सेकेंट का विरोध रखते हुए उसने भी यही बताया. झक मार कर वह सो गयी. नींद टूटी, तो दिन के नौ बज रहे थे. वह घोर निराशा में डूब गयी. उसने मान लिया कि इस बार भी नतीजा अच्छा नहीं रहेगा, मगर इस बार ऐसा होने की वजह बदली-बदली होगी. उसे पिछले दो साल से यह यकीन था कि भले परीक्षा इंटर की हो, सवालों का उसका जवाब एमए स्तर का होता है. अब चूंकि कॉपी जांचने वाले गुरुजी इंटर स्तर के शिक्षक होते हैं, सो एमए स्तर का जवाब उनकी समझ में नहीं आता. इसलिए वे सही-सही नंबर नहीं दे पाते. उनके प्रति उसे गुस्सा नहीं, सहानुभूति थी और इस सहानुभूति में उसने इस बार अपना स्टैंडर बड़ी मेहनत के बाद इंटर स्तर का घटाया था, मगर मेरे कूकर ने उसकी मेहनत पर सीटी मार दी. ऐसा न होता, तो मां के जगने तक जाने वह कितने सवालों को याद कर चुकी होती, जो उसे अच्छे नंबर ही नहीं दिलाने, कॉलेज में अब्बल भी बना देते.
खैर. दूसरी रात भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ. अगले दिन सबेरे-सबेरे मेरे पड़ोसी और बाकी पड़ोसियों के मुकबाले मेरे ज्यादा करीबी दूबे जी आये. सुखद समाचार लाये. आधी रात को खाना बनाने की तकलीफ से मुझे मुक्त करने आये. अब रात का खाना मेरे घर पहुंचने के पहले मुहल्ले की ओर से पहुंचा देने का मधुर धुन सुनाया. मैं तो गदगद था. सुना था, बेसुरा गाने वाले सुरीले गायकों के मुकाबले ज्यादा सौभाग्यशाली, अमीर और सुखी होते हैं. मुहल्ले भर के लोग उन्हें इसलिए पैसे देते हैं कि वह चौबीस में से एक भी प्रहर अपना राग अलापने की तकलीफ न करे. मेरे मन में आया, अगर ऐसे गायक मिलें, तो मैं उन्हें उनसे बड़ा अपना यह सौभाग्य दिखाऊं.
बहरहाल, उसके बाद से हर रात मेरे खाने में तरह-तरह की चीजें आने लगीं. कभी लिट्टी और चोखा, तो कभी पूड़ी और पनीर की सब्जी. कभी मिर्च और तेल में डुबकी लगाते तले हुए अंड़े, तो कभी मसालों में डूबी-फंसी मुर्गे की टांगें. मैं धन्य-धन्य कर उठता.
हर रात तरह-तरह के लजीज भोजन के सौभाग्य ने मुङो दूबे जी और मुहल्ले के दूसरे लोगों के प्रति कर्तव्यबोध से भर दिया. मैं इस भोजन के पैसे तो नहीं चुका सकता था. किसी के घर जाकर यह नहीं कह सकता था कि आपने मेरे लिए खाना भेजा है, इसके ये पैसे लीजिए. यह अशिष्टता होती. लिहाजा अक्सर तर-तरकारी खरीद लाता और बच्चों के हाथों पड़ोसियों के घर भेज देता. वे भी सहज भाव से इसे स्वीकार कर लेते. फिर बच्चों का खयाल आया. उनके लिए डार्क फैंटासी और डेलिसस जैसे थोड़े महंगे बिस्किट लाने लगा. बच्चे बड़े आदर से उसे ग्रहण और मुङो कृतार्थ करने लगे. धीरे-धीरे बिस्किट के पैकेट और सब्जी के झोले के आकार और वजन बढ़ने लगे.
मुहल्ले में मेरी कद्र बढ़ गयी थी. जो महिलाएं कल तक मुङो देख कर भी अनदेखा करती थीं, अब सामने से गुजरता देख अपने पल्लू संभालतीं या अपने सर पर आंचल डाल लेतीं. गोया कि मैं मुहल्ले का ऐसा भला मानव हूं कि ऐसा नहीं करना मेरे प्रति उनकी बेअदबी होगी. उन महिलाओं के प्रति मेरी सोच में बड़ा परिवर्तन आया. मैं जब भी उन्हें देखता, मेरे अंदर यह विचार बड़े सम्मान के साथ सर उठाता कि भले ही ये देखने और ओढ़ने-पहनने में जैसी भी हों, पाक कला में उनका कोई मुकाबला नहीं. कभी कोई मेरी कार या मोटरसाइकिल, जिन्हें मैं दूसरों से मांग कर चलाता था, मांग ले जाता, तो उसके देर से लौटने और ज्यादा पेट्रोल खर्च करने पर मेरे मन में हिंसक भाव पैदा नहीं होते. मैंने जोड़ कर देखा. होटल में हर रात का खाना खाने के मुकाबले ये सब्जी, बिस्किट और पेट्रोल काफी सस्ते थे. मेरे दफ्तर में भी इस प्रकरण की चर्चा होती. साथियों ने तीन बातों पर पक्की मुहर लगा दी. एक कि मैं सौभाग्यशाली हूं. दूसरा कि भोजपुर क्षेत्र के लोग खाने-खिलाने के मामले में बड़े अमीर हैं. तीसरा कि मुङो इस मुहल्ले को कभी नहीं छोड़ना चाहिए.
कुल 28 दिन इसी तरह बीते. बीच में चार दिन अपने शहर भी घूम आया. इस तरह बाइस रात मैंने पड़ोसियों के सौजन्य से प्राप्त भोजन ग्रहण किया और हर कौर के साथ इस विश्वास अपने अंदर भरता रहा कि होटल के खाने से जो भी क्षति हुई, उसकी पूरी-पूरी भरपाई हो रही है. मैं फिर से मोटा और वजनी हो रहा हूं.
29वें दिन रात के खाने के साथ एक लिफाफा भी था. मेरा दिल जोर से धड़का. इस शहर में मेरे इस ठिकाने की खबर किसी को न थी. खास कर ऐसे किसी व्यक्ति को, जो पत्र लिख सकता हो. फिर यह यह पत्र कैसा! कौतूहल कम, घबराहट ज्यादा के साथ मैंने लिफाफा खोला. उसमें अनाभ्यस्त लिखावट का मजबून देख कर दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. तभी नींद में डूबी गोल-गोल आंखों और भारी-भारी आवाज के साथ दूबे जी प्रकट हुए. मेरी हैरानी देख कर ऐसे मुस्कुराये, जैसे मैं रंगे हाथों पकड़ा गया.
‘तो पढ़ लिया ना! सांझ को सुमित्र आयी थी. वही यह चिट्ठी रख गयी है. सब ठीक है न !’ – दूबे जी बिना रूके ऐसे बोल गये, जैसे कोई नाटक का संवाद रट कर दुहरा गया हो.
‘मगर ऐसी कोई बात तो थी नहीं?’ – मैं बड़ी मुश्किल से बोल पाया.
‘अजी नहीं कैसे थी? कोई बात नहीं होती, तो आपके नाम यह चिट्टी ही क्यों आती? और भी तो किरायेदार हैं मुहल्ले में! उन्हें तो कोई पत्र नहीं आता!’- दूबे जी झपट कर बोले.
‘आप तो मेरे इतने करीबी हैं. अगर ऐसा कुछ होता, तो आपसे तो इसका जिक्र होता. मैं तो बस यही समझता रहा..’ – मेरा वाक्य अभी अधूरा था. दूबे जी ने उसे पूरा होने का जरा भी मौका नहीं दिया. बाले,‘जिक्र भला होती कैसे? आप तो इतने लट्ट थे कि सब्जी और बिस्किट लाते रहे. हमें लगा आपकी रजामंदी है इसमें.’
‘अब क्या करूं?’ – मैंने सहायता पाने की उम्मीद से यह पूछा.
‘करना क्या है? कल सुबह उसका बेटा मुन्ना आयेगा. खुद ही निबट लेगा.’ – दूबे जी मुङो मझदार में छोड़ गये थे. मुन्ना मुङो विलेन दिखने लगा. हाथ में पकड़ी हुई चिट्टी मेरे अंदर घबराहट पैदा कर रही थी. मैंने फिर से उसे देखा. उस पर मेरा ही नाम लिखा था. संदेह की कोई गुंजाइश नहीं थी. बित्ते भर के कागज पर कुछ अंक पसरे हुए थे. साथ में जोड़ और बराबर के चिह्न् भी थे. मुन्ना नुक्कड़ के रेस्टोरेंट का मालिक था. यह चिट्टी बाइस दिन के खाने का बिल था. मैंने एक झटके से जोड़ा. उस पर लिखी रकम इतनी थी, जितनी तीन माह के खाने के बदले मैंने होटल को देकर मुक्ति पायी थी. सर्दी बढ़ने लगी थी. रात आधी बीत चुकी थी. मेरे कानों में कूकर की तेज सीटी बजने लगी. दूबे जी जा चुके थे.
संपर्क ः 
मुख्य उप संपादक
पंचायतामा
प्रभात खबर, 9431177865,  ई-मेल ः- niradrk@gmail.com 

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