जलवायु परिवर्तन बढ़ा सकता है बिहार में कृषि संकट
आरके नीरद
विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन से अगले 5-10 सालों में कृषि की समस्या विकराल हो सकती है. इसका मतलब है कि बिहार में कृषि की चुनौतियां और बढ़ेंगी. राज्य की दो तिहाई आबादी की कृषि पर और कृषि की प्रकृति पर निर्भरता से जुड़ी समस्याएं पहले से कायम हैं. राज्य सरकार के दूसरे कृषि रोड मैप की अवधि 2017 में पूरी होने जा रही है. हाल के वर्षो दो कृषि रोड मैप से राज्य में खेती की सेहत में सुधार जरूर आया, मगर चुनौतियों के मुकाबले उपलब्धियों का ग्राफ और मेहनत की मांग करता है. जाहिर है कि कृषि के क्षेत्र में नयी सरकार का टास्क बड़ा है.
प्रथम दृष्टि में राज्य में कृषि की पहली समस्या सिंचाई की है. समय पर खाद-बीज की उपलब्धता इसकी दूसरी बड़ी समस्या है. तीसरी समस्या कृषि उपज की खरीद और स्थानीय बाजार व्यवस्था की कमी है. चौथी समस्या अनाज के भंडारण की व्यवस्था और सरकारी खरीद के बाद अनाज की पूरी कीमत किसानों को समय उपलब्ध करना तथा उस अनाज की सुरक्षा है. पांचवीं समस्या उत्पादकता बढ़ाने, कृषि संबंधी संस्थागत व्यवस्था में व्यापक सुधार, खेती के जोखिम को कम करने के बड़े उपाय तथा कृषि भूमि के पैटर्न में बदलाव है. इन समस्याओं को हल करने की दिशा में अब तो प्रयोग और प्रयास हुए हैं, नि:संदेह किसानों को उसका लाभ मिला है, लेकिन उस दिशा में पहले से ज्यादा काम करने की जरूरत होगी.
राज्य में औसत वर्षापात के मामले में जिलों के बीच काफी अंतर है. 2013 में देखें, तो 18 जिलों में औसत से ज्यादा वर्षापात हुआ, जबकि 20 जिलों में औसत से काफी कम. यह स्थिति करीब-करीब हर दो साल पर आती रही है. वर्षापात में जिलों के बीच की यह असमानता बड़ी चुनौती है और इससे निबटने के लिए सिंचाई क्षमता और जल प्रबंधन के कोशल को बढ़ाने की जरूरत होगी.
राज्य में दो दर्जन से अधिक बड़ी सिंचाई परियोजनाएं हैं, जो सालों से अधूरी पड़ी हैं. इन परियोजनाओं पर अब तक करोड़ों रुपये खर्च हुए हैं, जबकि इनकी आरंभिक लागत ..... करोड़ थी. इसी क्रम में दो बड़ी सिंचाई परियोजनाएं और भी हैं. एक पूर्वी गंडक सिंचाई परियोजना और दूसरी पश्चिमी कोसी सिंचाई परियोजना. ये दोनों करीब चार दशक से अधूरी हैं, जबकि जमीनी स्तर पर इन परियोजनाओं पर बहुत काम हो चुका है. इन दोनों सिंचाई परियोजनाओं को दो-ढ़ाई साल में पूरा किया जा सकता है. इनसे करीब 10 लाख हेक्टेयर जमीन की क्षमता बढ़ेगा और करीब 20 लाख टन अतिरिक्त खाद्यान्न का उत्पादन हो सकेगा. विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे राज्य में 1500 करोड़ की अतिरिक्त खुशहाली आयेगी.
किसानों की जीविका के वैकल्पिक साधन चाहिए
खेती पर निर्भर आबादी के लिए जीविका के वैकल्पिक साधन की जरूरत है. भूमि उपायोग के पैटर्न में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं है, जबकि कृषि पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता गया है. आबादी के अनुपात में कृषि भूमि नहीं बढ़ सकती, लेकिन कृषि भूमि पर निर्भरता को कम करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था हो सकती है. इसकी बड़ी जरूरत है. राज्य के 90 फीसदी ऐसे किसान हैं, जिनके पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है. इन्हीं किसानों के पास राज्य की 50 फीसदी कृषि भूमि है. 30 फीसदी कृषि भूमि संयुक्त है. ऐसे में लघु और सीमांत किसानों के लिए जीविका के वैकल्पिक साधन जुटाने की चुनौती है. यह वैकल्पिक साधन कृषि आधार ही हो, यह भी जरूरी है, ताकि कृषि में उनकी निरंतरता बनी रहे.
राज्य में कृषि क्षेत्र में अब भी निवेश की दर कम और निवेश का आकार छोटा है. इसे बढ़ाने की जरूरत होगी. तभी कृषि के स्वरूप, उत्पादकता, कृषि उपज की कीमत और कृषि समर्थित छोटे-बड़े उद्योग के विस्तार के अनुकूल परिस्थितियां तैयार हो सकेंगी.
जोखिम को कम करने के करने होंगे उपाय
किसान खेती से जुड़े रहें और व्यक्तिगत पूंजी निवेश की दर बढ़े, इसके लिए सरकार को जोखिम करने वाले प्रभावी और भी उपाय विकसित करने होंगे. कृषि की मौसम पर निर्भरता कम नहीं हो पा रही हैं. इस सदी में छह बार ऐसा हुआ है, जब पूरे साल में औसत से कम वर्षा हुई. सूखे, बाढ़ और असमान वर्षापात के बड़े असर को देखते हुए कृषि के जोखिम को कम करने को उपायों को बढ़ाना होगा.
बढ़ानी होगी औसत उत्पादकता
बिहार में उत्पदकता दर को और बढ़ाने की जरूरत है. खास कर दलहन, मोटे अनाज और गेहूं के मामले में. धान की उत्पादकता में बिहार ने चीन के रिकॉर्ड को तोड़ा. आलू में भी उत्पादकता दर में रिकॉर्ड वृद्धि हुई, लेकिन इस उपलब्धि को सीमित क्षेत्र से निकाल कर पूरे राज्य में विस्तार देने की चुनौती अब भी बनी है. राज्य के 47 फीसदी किसान अब भी 1.5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से उत्पादन करते हैं और हमारी 43 फीसदी आवश्यकता यही पूरा करते हैं. इन्हें उत्पादकता के उच्च दर से जोड़ने की जरूरत है.
उपलब्धियां
नालंदा के किसानों ने धान उत्पादन में चीन के रिकॉर्ड को तोड़ा.
कृषि में इंद्रधनुषी बदलाव आया है. इसके विस्तार की जरूरत है.
मधु उत्पादन में बिहार देश में पहला स्थान रखता है.
छोटे होते खेत, बढ़ता बोझ
कृषि भूमि का औसत आकार तेजी से छोटा हुआ है. यह एक बड़ी चुनौती है, जिसका सीधा नहीं, वैकल्पिक समाधान हो सकता है. सरकार को इस पर प्राथमिकता के आधार पर वर्क आउट करना होगा. 1995-96 में कृषि भूमि का औसत आकार 0.75 हेक्टेयर था. 2005-06 में यह 4.43 हुआ. पिछले एक दशक में यह आकार और भी छोटा हुआ है.