जजों की कमी से अदालतों पर बढ़ रहा मुकदमों की बोझ
आरके नीरदचार दिन पहले (15 दिसंबर) पटना उच्च न्यायालय ने हत्या के एक सजायाफ्ता व्यक्ति की जमानत याचिका पर पहले सुनायी करने के उसके अनुरोध को ठुकरा दिया. न्यायालय ने ऐसा इसलिए किया कि सब के लिए न्याय के समान अवसर के सिद्धांत का अतिक्रमण न हो. अदालत ने यह भी टिपण्णी की कि 56 हजार जमानत याचिकाएं पटना उच्च न्यायालय में लंबित हैं. विभिन्न मामलों में सजा प्राप्त हजारों लोग जमान नहीं मिलने के कारण जेलों में बंद हैं. सिविल और अपराधिक प्रकृति के 1.35 लाख मुकदमे पटना उच्च न्यायालय के समक्ष विचार के लिए पड़े हैं. यह आंकड़ा बेशक सामान्य नहीं है. बिहार के मुकाबले बंबई हाइकोर्ट का क्षेत्रधिकार बड़ा है और उसके अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या भी बिहार से ज्यादा है. फिर भी बंबई हाई कोर्ट के समक्ष अग्रिम जमानत की केवल 756 और नियमित 1000 याचिकाएं लंबित हैं. त्वरित न्याय और मुकदमों के निष्पादन में क्या हैं बड़ी बाधाएं? देश और बिहार में कैसे और क्यों बढ़ रहा है मुकदमों का बोझ. एक रिपोर्ट.
सुप्रीम कोर्ट की त्रैमासिक रिपोर्ट के विेषण के अनुसार बिहार की निचली अदालतों में हर तीन माह में करीब एक लाख नये मुकदमे दर्ज होते हैं, जबकि मुकदमों के निष्पादन की दर नये मुकदमों की संख्या की दृष्टि से 70 से 75 फीसदी के करीब है. यानी हार तीन माह में 25 से 30 फीसदी मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है. यही हाल पटना हाई कोर्ट का है. हर तीन माह में 20 से 25 हजार नये मुकदमे यहां आते हैं, जबकि निष्पादन दर नये मुकदमों की संख्या की तुलना में 90 से 95 फीसदी है. यानी यहां भी पुराने मामलों का बोझ बढ़ रहा है. स्थिति यह है कि साल 2013 की अंतिम तिमाही में 69 हजार से ज्यादा मुकदमे निबटाये जाने के बाद भी उस साल के 31 दिसंबर तक बिहार की निचली अदालतों में 18 लाख 07 हजार 782 मुकदमे लंबित रह गये. अगले छह माह में इस संख्या में और सात हजार का इजाफा हो गया, जबकि अप्रैल से जून के बीच 78 हजार से ज्यादा मुकदमे निबटाये गये. उस अवधि में 1.07 लाख 782 नये मुकदमे दर्ज हुए थे. इससे साफ है कि जिस तेजी से मुकदमों को निचली अदालतें निबटा रही हैं, उसी अनुपात में मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है.
इस तरह बढ़ रहा मुकदमों का बोझ
इसी तरह पटना उच्च न्यायालय में भी लंबित मुकदमों की संख्या बढ़ रही है. 31 दिसंबर को जहां 1.32 लाख 155 मुकदमे लंबित थे, वहीं जुलाई 2014 के अंत तक यह संख्या बढ़ कर 1.33 लाख 44 हो गयी. आज की तिथि में यहां सिविल और क्रिमिनल लंबित मुकदमों की संख्या 1.35 लाख हो गयी है.
मुकदमों में फंसी है हजारों एकड़ जमीन
राज्य के सिविल कोर्ट में लंबित मुकदमों की बात करें, तो इनकी संख्या लगभग 19 लाख है. स्पष्ट है कि यह संख्या सामान्य नहीं है. जहां मुकदमों के इस बोझ को कम करना अदालतों के लिए बड़ी चुनौती है, वहीं इसके पक्षकारों के लिए न्याय पाना बड़े सब्र का हिस्सा. इन लंबित मुकदमों में बड़ी संख्या वैसे भूमि विवाद के हैं, जिनमें दशकों से अदालती फैसले की बजाय तारीखें मिल रही हैं. अकेले पटना उच्च न्यायालय में जमीन संबंधी 293 पुराने मुकदमे दर्ज हैं. इन मुकदमों में 20572 एकड़ जमीन फंसी हुई है. इसी तरह रेवेन्यू बोर्ड में 76, प्रमंडलीय आयुक्तों के न्यायालय में 21, समाहर्ताओं के यहां 272, अपर समाहर्ताओं के यहां 218 तथा एसडीओ के यहां 184 मुकदमे भूमि विवाद के हैं, जो सालों से लंबित हैं. ये मुकदमे भी हजारों एकड़ जमीन के मालिकाना हक से जुड़े हैं. इन मुकदमों को तेजी से निबटाना राज्य की सिविल और राजस्व अदालतों की बड़ी चुनौती है.
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पहल
हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी यह महसूस किया है कि देश में पांच-दस साल से भी अधिक समय से लंबित मुकदमों को तेजी से निबटाये बगैर न्याय व्यवस्था को जनहितकारी नहीं बनाया जा सकता. उसने इसके लिए सभी अदालतों को सप्ताह में एक-दो दिन केवल पुराने मुकदमों को निबटने के लिए नियत करने को कहा है, लेकिन जजों की कमी के कारण अब भी मुकदमों का बोझ कम नहीं हो रहा है. जमानत और न्याय के लिए लाखों लोग सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं.
उच्च न्यायालय और राज्य की निचली अदालतों में जजों के अनेक पद खाली
दरअसल बिहार में त्वरित न्याय और मुकदमों के त्वरित निष्पादन की राह में कई बाधाएं हैं. पहली बाधा तो पटना उच्च न्यायालय और बिहार की निचली अदालतों में बड़ी संख्या में जजों के पदों का खाली होना है. पटना उच्च न्यायालय में न्यायाधिशों के पहले से 11 पद खाली थे. हाल में यह संख्या बढ़ कर 16 हो गयी. इसी साल अगस्त में राज्यसभा में पेश की गयी रिपोर्ट के आधार पर देखें, तो देश में उच्च न्यायालय के न्यायाधियों के सबसे ज्यादा 63 फीसदी पद पटना उच्च न्यायालय में रिक्त हैं. इलाहाबाद उच्च न्यायालय, जहां न्यायाधिशों के सबसे अधिक 160 पद हैं, वहां भी केवल 84 यानी 52.85 फीसदी पद खाली हैं. जिस बंबई हाई कोर्ट में सबसे कम मुकदमे लंबित हैं, वहां न्यायाधियों के 32 फीसदी पद खाली हैं. देश में केवल चार ऐसे उच्च न्यायालय (कर्नाटक, मेघालय, सिक्किम तथा त्रिपुरा) हैं, जहां कोई रिक्ति नहीं है. बड़ी संख्या में जजों के पदों के रिक्त रहने का का नजीता राष्ट्रीय स्तर पर दिख रहा है. मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है. यही हाल निचली अदालतों का है. निचली अदलतों में जजों की संख्या के मामले में बिहार उच्च प्रदेश (2097 पद), मप्र (2072 पद) और गुजरात (1963 पद) के बाद चौथे नंबर पर है, जहां 1670 पद स्वीकृत हैं, लेकिन पिछले साल दिसंबर में लोकसभा में पेश रिपोर्ट के मुताबिक निचली अदालतों में जजों के रिक्त पदों के मामले में बिहार गुजरात (747 रिक्त पद) के बाद दूसरे स्थान पर है, जहां 643 पद रिक्त हैं. लिहाजा गुजरात लंबित मुकदमों के मामले में भी देश भर में आगे है. बहरहाल, बिहार की निचली अदालतों और पटना उच्च न्यायालय में जब तक जजों के खाली पद तेजी ने नहीं भरे जायेंगे, तब तक त्वरित न्याय या मुकदमों के बोझ को कम करना असंभव होगा.
त्वरित न्याय के उपायों पर जजों की कमी भारी
बिहार में जमीन से जुड़े पुराने मुकदमों का बोझ अब भी बड़ा है. हाल में राज्य में भूमि विवाद में हत्या की कई घटनाएं हुई हैं. यहां तक कि एक युवक ने इसी विवाद में मां और बहन तक को मार डाला. भूमि विवाद में हत्या जैसी वारदात के पीछे उत्तेजना ही नहीं, हताशा भी बड़ी वजह है. इसे त्वरित न्याय सुलभ कराने की व्यवस्था से ही दूर किया जा सकता है. मुकदमों के बोझ को कम करने और पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाने के लिए देश में कई प्रयोग हुए हैं. फास्ट ट्रैक कोर्ट, विशेष अदालत, लोक अदालत और मुकदमा पूर्व समझौते वगैरह, लेकिन इनसे नये मुकदमों को निबटाने में भले मदद मिली है, पुराने मुकदमों का बोझ कम नहीं हुआ है. खास कर जमीन संबंधी मुकदमों का बोझ. अब भी 20-25 सालों से ऐसे मुकदमे लंबित हैं.
देश में जजों की कमी व लंबित मुकदमों की स्थिति
त्नदेश में प्रति दस लाख की आबादी पर 17 जज हैं, जबकि यह संख्या 50 होनी चाहिए.त्नदेश की सभी अदालतों में करीब पांच हजार (23 फीसदी) जजों की कमी है.
त्नदेश की सभी जिला एवं सत्र अदालतों में 2.5 करोड़ मुकदमे लंबित हैं.
त्नकरीब 20 लाख मुकदमे ऐसे हैं, जो दस साल भी अधिक समय से चल रहे हैं.
त्न सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और लोअर कोर्ट में जजों के सभी पद भर दिये जाएं, तो
लंबित मुकदमों का औसत प्रति जज 1,625 होगा.
(लोकसभा , 31.12.2013 की रिपोर्ट के आधार पर)
पटना उच्च न्यायालय में लंबित मुकदमे
जमानत याचिका 0.56 लाख
कुल सिविल व क्रिमिनल वाद 1.35 लाख
त्नउच्च न्यायलय, पटना में जमानत याचिकाओं का औसत प्रति न्यायाधीश 2074.
त्नसिविल व क्रिमिनल मुकदमों का औसत प्रति न्यायाधीश 5000.
निचली अदलतों में जजों की अधिक संख्या वाले पांच राज्यों की स्थिति
राज्य कुल पद खाली रिक्त
उत्तर प्रदेश 2097 1761 336
महाराष्ट्र 2072 1784 288
गुजरात 1963 1216 747
बिहार 1670 1027 643
मध्य प्रदेश 1460 1243 217
स्नेत : लोकसभा, 31.12.2014
उच्च न्यायालयों में जजों के पद
उच्च न्यायालय कुल पद खाली रिक्तइलाहाबाद 160 76 84
बंबई 94 64 30
पंजाब व हरियाणा 85 54 31
कर्नाटक 62 32 30
दिल्ली 60 40 20
मद्रास 60 38 22
कलकत्ता 58 44 14
मध्य प्रदेश 53 33 20
गुजरात 52 29 23
हैदराबाद 49 27 22
पटना 43 32 16
जम्मू-कश्मीर 27 10 7
ओड़िशा 27 22 5
झारखंड 25 14 11
गुवहाटी 24 17 7
छत्तीसगढ़ 22 9 13
हिमाचल प्रदेश 13 7 6
उत्तराखंड 11 6 5
मणीपुर 4 3 1
केरल (38), मेघालय (3),सिक्किम (3) तथा त्रिपुरा (4) उच्च न्यायालयों में न्यायाधिशों का कोई पद रिक्त नहीं.
नोट: पटना उच्च न्यायालय का आकड़ा अद्यतन स्थिति पर आधारित.
स्नेत : राज्यसभा, 1 अगस्त 2015.
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