Monday, 24 August 2015

नारों ने सत्ता दिलायी, छीनी भी

नारे और जुमले चुनाव के ऐसे पहलू हैं, जिनमें राजनीतिक दलों की सोच और काल-परिस्थिति के अक्स पूरी शिद्दत से उतारे जाते हैं. इसे चूंकि हर बार चुनावी समीकरण और सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं. इसलिए चुनावी नारे और जुमले भी बदल जाते हैं. इन नारों में समस और समाज का मिजाज भी छिपा होता है. 1977 में ‘इंदिरा हटाओ, देश बचाओ’ के नारे ने जहां केंद्र की सत्ता से कांग्रेस को उखाड़ फेंका, वहीं 1980 के चुनाव में ‘आधी रोटी खायेंगे, इंदिरा को जितायेंगे’ के नारे ने सत्ता में उसकी वापसी का रास्ता खोला. चुनावी नारों ने जनता को कुछ दिया हो या नहीं, दलों को अपने पक्ष में हवा बनाने में खूब मदद की है. इसलिए हर चुनाव में राजनीतिक पार्टियों का पहला जोर नारों पर होता है. इसमें अपनी उपलब्धियों की चर्चा, भावी कार्यक्रमों और नीतियों की घोषणा तथा विपक्ष पर हमले भी होते है.
      1971 में  इंदिरा गांधी के नारे ‘गरीबी हटाओ’ ने देश भर के गरीबों को पहली बार राजनीतिक सोच की मुख्य धारा से जोड़ा. तब ऐसा करना राजनीतिक परिस्थितियों की दृष्टि से इंदिरा गांधी की विवशता थी. तब रोटी, कपड़ा और मकान जैसे सवालों के साथ दूसरे राजनीतिक दलों तो चुनौती दे ही रहे थे, वर्चस्व के सवाल पर कांग्रेस की आंतरिक खींचतान भी कम नहीं थी.
         राजनीतिक विेषकों ने इसे इंदिरा गांधी की लेफ्ट ओरिएंटेड पॉलिसी कहा. हालांकि जल्द ही इस नारे का आकर्षण खत्म हो गया और लोगों का इससे मोहभंग हुआ. परिणाम हुआ कि कांग्रेस पर ‘गरीबी नहीं, गरीब हटाओ’ की तोहमत भरी जुमलेबाजी हुई. यही हश्र  2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नारे ‘काले धन वापस लायेंगे’ और ‘सब का साथ, सब का विकास’ का हुआ या होता दिख रहा है. चुनाव के दौरान  इन नारों ने लोगों पर खूब असर डाला, मगर चुनाव के बाद काले धन की वापसी के सवाल पर जब केंद्र सरकार घिर गयी, तब भाजपा ने ही यह कह कर इसकी हवा निकाल दी कि यह चुनावी जुमला था. भूमि अधिग्रहण बिल को संसद में पारित न करा पाने की स्थिति में  तीन-तीन बार अध्यादेश जारी कर इसे प्रभावी बनाने की भाजपा नीत सरकार की कार्रवाई ने ‘सब का साथ, सब का विकास’ के नारे पर संदेह पैदा किया. अब तो इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ की तर्ज पर इस नारे पर भी  ‘सब का साथ, खास का विकास’ की तोहमत भरी जुमलेबाजी की जाने लगी है.
एक नारा और भी बेमौत मरता दिख रहा है. वह है ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’. व्यापमं घोटाले और ललित मोदी प्रकरण में इस नारे की चमक धुलती नजर आ रही है. इन सबके बावजूद चुनाव और नारों का रिश्ता कमजोर नहीं हुआ. दरअसल चुनावी नारों का अपना समाजशास्त्रीय और यथार्थवादी पक्ष भी है. इनका सामाजिक मनोविज्ञान पर गहरा प्रभाव होता है. यह चुनाव अभियान और  कार्यकर्ताओं में जोश पैदा करता है. इसलिए इसमें आक्र ामकता का समावेश करने के भरपूर प्रयास होते रहे हैं. इस प्रयास में कई बार इस आक्रमकता ने राजनीतिक मर्यादा और सामाजिक सौहार्द पर सीधा प्रहार किया है. इसके प्रभाव भी नकारात्मक हुए हैं, लेकिन चुनावी जुनून में इसकी परवाह तब तक नहीं की गयी, जब तक कि राजनीतिक दलों को इससे नुकसान नहीं पहुंचा. बहरहाल, जोशीले नारे गढ़ने में वाम दलों को महारत हासिल रही है.

खूब हुईं नारों की जुगलबंदियां 

वाम दलों के आक्रामक और जोशीले नारे चुनाव और चुनाव के बाद भी जनमानस पर गहरी छाप छोड़ते हैं. जन मुद्दों पर गढ़े इसके नारे भी दमदार रहे हैं. एक आम आदमी भी इन नारों से खुद के जज्बातों को पूरी ताकत से प्रकट करने में सक्षम होता है. इसके नारों की आक्र ामकता को दूसरे दलों ने भी स्वीकारा और उन्होंने भी इसी तर्ज को अपनाया. जब देश आजाद हुआ और केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी, तब के सामाजिक-आर्थिक यथार्थ को केंद्र में रख कर वाम पंथियों ने नारा गढ़ा कि ‘देश की जनता भूखी है, यह आजादी झूठी है’. 
       इस नारे से समाज में गोलबंदी का राजनीतिक अभियान चला. केंद्र की सत्ता हासिल करने के लिए चुनावी नारा भी गढ़ा गया. वह था ‘लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’. 90 के दशक में भाजपा ने इसी तर्ज पर चुनावी नारा बुलंद किया था, ‘अटल- आडवाणी-कमल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’. गौर करें, तो 1990 तक चुनावी नारों की जुगलबंदी बड़ी रोचक थी. इसमें शालीनता और मर्यादा का पूरा पालन होता था. 60 के दशक में कांग्रेस के खिलाफ जनसंघ पूरी मजबूती से चुनाव मैदान में उतरा था. उसका चुनाव चिह्न् दीपक था और कांग्रेस का जोड़ा बैल. तब जनसंघ ने नारा दिया था, ‘जली झोंपड़ी-भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल’. कांग्रेस ने इसके जवाब में नारा लगाया, ‘इस दीपक में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं’. ये दोनों नारे बाद के सालों में भी लोगों के जेहन में गूंजते रहे. जनसंघ का एक और नारा नारा खूब लोकिप्रय हुआ था,
‘हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, 
हर घर में दीपक, जनसंघ की निशानी’. 
आपातकाल जनसंघ का नारा आया,
‘अटल बिहारी बोल रहा है, 
इंदिरा का शासन डोल रहा है’. 
कहते हैं कि इंदिरा जी की राय बरेली से हार में इस नारे का भी योगदान था.
 भारतीय चुनावी राजनीति में समाजवादियों ने भी अपनी पॉलिटिकल आयडियोलॉजी को आम जन तक पहुंचाने के लिए नारों का सहारा लिया. इनमें सन सत्तर के दशक में डॉ राम मनोहर लोहिया का यह नारा ‘सोशिलस्टों ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’ सबसे ज्यादा प्रभावी माना गया. इस ने समाज के पिछड़े तबके के लोगों को गोलबंद करने में बड़ी भूमिका निभायी. यह लोहिया जी के राजनीतिक दर्शन की बुनियाद थी. आपातकाल के बाद जिन नेताओं ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ा, उनमें इंदिरा मंत्रिमंडल के कृषि एवं सिंचाई मंत्री जगजीवन राम भी थे. तब बिहार में उनके समर्थकों का यह नारा भी खूब गूंजा था,
‘जगजीवन राम की आई आंधी, उड़ जायेगी इंदिरा गांधी’ और ‘आकाश से कहें नेहरू पुकार, मत कर बेटी अत्याचार.’  
       आपातकाल के बाद, 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी ने ‘इंदिरा हटाओ, देश बचाओ’ का नारा दिया. इस नारे को आपातकाल में जनता को हुई तकलीफों का समर्थन भी मिला. लिहाजा इस नारे को बड़ी आसानी से लोगों ने स्वीकार कर लिया. उन दिनों बिहार में एक और नारा गांव-शहर में गूंज रहा था. वह था ‘जमीन गयी चकबंदी में, मरद गया नसबंदी में’. यह संजय गांधी के जबरिया नसबंदी पर तीखी जन प्रतिक्रि या थी. बहरहाल, जनता पार्टी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और 1980 में मध्यावधि चुनाव हुआ.

आक्रोश का माध्यम बने नारे

आपातकाल में राजनीतिक नारे सत्ता के खिलाफ जनता के आक्रोश की अभिव्यक्ति का बड़ा माध्यम बने और राजनीतिक रूप से लोगों को जागरूक भी किया. उस समय के नारों पर गौर करें, तो उन पर साहित्य का बड़ा प्रभाव दिखता है. उस समय के साहित्यकारों ने भी आपातकाल को लेकर खूब राजनीतिक कविताएं लिखीं. उन कविताओं को सभाओं में गाया गया और उनकी पंक्तियों को नारा बनाया गया. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं की पंक्तियां तो जेपी आंदोलन के प्रांण थीं, लेकिन 1977 में बनी जनता सरकार पांच साल पूरा नहीं कर सकी ओर 1980 में मध्याविध चुनाव हुआ. इस सरकार के ढ़ाई साल के कार्यकाल में जनता को हुई परेशानियों को कांग्रेस ने मुद्दा बनाया, मगर उसने  नकारात्मक की जगह सकारात्मक नारे गढ़े. इनमें सबसे चर्चित और राजनीतिक दृष्टि से दूरगामी प्रभाव वाला नारा था ‘आधी रोटर खायेंगे, इंदिरा को जितायेंगे’. इस नारे ने देश को राजनीतिक विकल्प दिया गया. इसमें जनता पार्टी सरकार की विफलता का नैराश्य भी था, लेकिन दृष्टि सकारात्मक थी. इस सकारात्मक नारे ने सत्ता में इंदिरा जी की वापसी करायी. कांग्रेस को 351 सीटें मिलीं. इसी चुनाव से ‘स्थिर सरकार’ चुनावी मुद्दा बना. जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल पूरा न कर पाने को आधार बना कर कांग्रेस ने एक और सकारात्मक नारा दिया था, जो आज भी देश-राज्यों के चुनावों में बड़ा मुद्दा बन रहा है. यह नारा था, ‘चुनिए उन्हें जो सरकार चला सकें’.
इससे पहले, इंदिरा गांधी जब रायबरेली का चुनाव हारने के बाद चिकमंगलूर से उपचुनाव लड़ीं, तब कांग्रेस ने यह नारा दिया था,
‘एक शेरनी सौ लंगूर,
 चिकमंगलूर, भाई चिकमंगलूर’. 
इस चुनाव में उन्हें जीत मिली थी. 1984 में देश की राजनीतिक परिस्थिति फिर बदली. इंदिरा जी की हत्या हो गयी. कांग्रेस ने उससे उपजी सहानुभूति को बटोरने के लिए पूरे जोश से नारा लगाया ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा जी का नाम रहेगा’. इस नारे ने कांग्रेस को भारी जीत दिलायी. 1984-85 में हुए आठवीं लोकसभा चुनाव में इस नारे के साथ-साथ राजीव गांधी के समर्थन में गढ़े गये नारे ‘उठे करोड़ों हाथ हैं, राजीव जी के साथ हैं’ ने भी कांग्रेस को भरपूर ताकत दी और 409 सीटों पर इसे कामयाबी मिली. इसे कांग्रेस का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कहा गया. राष्ट्रीय विपक्षी पर्टियों का ऐसा सफाया हुआ कि लोकसभा में प्रतिपक्ष मुख्य विपक्षी पार्टी  तेलुगुदेशम पार्टी बनी. उसे 30 सीटें मिलीं थीं, लेकिन बोफोर्स कांड और पंजाब में आतंकवाद जैसे घरेलू मुद्दों ने राजीव गांधी को अलोकप्रिय बना दिया. लिहाजा 1989 के चुनाव में विपक्ष के पास कई जोशीले और धारदार नारे थे. इनमें विश्वनाथ प्रसाद प्रताप सिंह के लिए लगाया गया नारा ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’ ज्यादा चर्चित रहा.  विश्वनाथ प्रताप सिंह को बोफोर्स सौदे की अंदर की जानकारी रखने के कारण राजीव मंत्रिमंडल से बरखास्त किया गया था. उन्होंने इस सौदे को लेकर देश भर में राजनीतिक तूफान पैदा किया. हालांकि वह करीब 11 माह ही प्रधानमंत्री रह पाये. इस बीच दो बड़ी घटनाएं हुईं, जिसने देश की राजनीति, चुनाव और चुनावी नारों की दिशा बदल दी. एक घटना थी मंडल कमीशन की सिफारिशों का सार्वजनिक होना और दूसरा लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्र.

खूब काटी गयी नारों की फसल

चुनाव में नारों का प्रयोग और प्रभाव 1990 के बाद भी कायम रहा. 1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सहानुभूति वोट बटोरने में नारे ने बड़ी मदद की थी. उस साल राजीव गांधी की हत्या चुनाव के दौरान ही हुई थी. उनकी हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. इसे आतंकवाद के खिलाफ उनकी शहादत के रूप में स्थापित किया गया. कांग्रेस ने नारा दिया  ‘राजीव तेरा ये बलिदान, याद करेगा हिंदुस्तान’. इस नारे की बदौलत उसने उस चुनाव में सबसे ज्यादा 232 सीटें पायीं. हालांकि इस चुनाव परिणाम ने लोकसभा को त्रिशंकु ही बनाया था. स्पष्ट बहुमत किसी दल को नहीं था.
नारा गढ़ने और उसकी फसल काटने में भाजपा भी पीछे नहीं रही. अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करने के बाद उसने नारा दिया ‘अबकी बारी, अटल बिहारी’. भाजपा की सरकार जब एक बार सत्ता में आये, तो उसके लिए दुबारा जमीन तैयार की गयी. तब नारा दिया ‘कहो दिल से, अटल बिहारी फिर से’. इस नारे को पिछले साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपने नेता अरविंद केजरीवाल के नाम को केंद्र में रख कर आम आदमी पार्टी ने खूब भुनाया. यानी नारे किसी दल के नहीं रहे. चुनावों में नारे दलों के बीच लुढ़के भी रहे. जैसे 1960 के दशक में वाम दलों के केंद्र की सत्ता पर कब्जा करने के लिए गढ़े गये नारे ‘लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’ को 1990 के दशक में भाजपा ने अपनाया. उसने अपने दो नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को आगे कर लोकसभा की चुनावी यात्र की. तब उसने वाम दलों के इसी नारे को आधार बना कर अपना नारा दिया ‘अटल- आडवाणी-कमल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’.
बहरहाल, चुनावी नारे गढ़ने में माहिर भाजपा को उसके एक नारे ने उसे बड़ा नुकसान पहुंचाया. वह था ‘इंडिया शाइनिंग’.  इस नारे का हिंदी अनुवाद भी गढ़ा गया. वह था ‘भारत उदय’. यह नारा फ्लॉप ही नहीं रहा, इस ने एनडीए की चमक भी धो दी. इस ने लोकसभा चुनाव में भाजपा से गद्दी छीन ली. 1990 के बाद के बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों में राम मंदिर एक था. इसे लेकर भी भाजपा और उसकी आनुशांगिक इकाइयों ने कई नारे गढ़े, जिन्होंने सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में एक आंदोलन जैसी भावना पैदा की. हालांकि ये सीधे तौर पर चुनावी नारे नहीं  थे, लेकिन चुनाव पर इनका असर पड़ा. ये नारे थे ‘सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनायेंगे’, ‘अयोध्या तो पहली झांकी है, काशी मथुरा बाकी’ और ‘जय श्रीराम’. 
1990 के बाद, खास तौर पर मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के बाद कुछ ऐसे जातिवादी नारे भी गढ़े गये, तो सीधे तौर पर चुनावी नहीं थे, मगर परोक्ष रूप से चुनावों पर उनका भी असर पड़ा. बाद के सालों में विकास भी चुनाव का मुद्दा बना. खास कर नीतीश कुमार सरकार के आने के बाद. इनमें जदयू का यह नारा खूब सुना गया, ‘बोल रहा है टीवी-अखबार, सबसे आगे नीतीश कुमार’. इस चुनाव में भी उसके नारे खूब गूंज रहे हैं. इनमें ‘बढ़ता बिहार’, ‘अब बढ़ चला बिहार’, ‘बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो’, ‘नीतीशे को जिताये हैं, नीतीशे को जितायेंगे’ वगैरह. इस सदी में बिहार को लेकर भाजपा के भी नारे विकास पर केंद्रित रहे. जैसे ‘अपना वोट विकास को’, ‘बढ़ता बिहार, बनता बिहार’, ‘पांच साल, बिहार खुशहाल’ आदि.

प्रकाशित : प्रभात खबर, 11 से 22 अगस्त 15, चार किस्तों में.

कब मिलेगा आधी आबादी को पूरा हक 

राजनीति में आधी आबादी की भागीदारी के लिहाज से बिहार की स्थिति कमोवेश वही है, जो पूरे देश की है. टिकट देने में भी पार्टियां उनकी अनदेखी करती रही हैं. इस वजह से विधानसभा या लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व उस अनुपात से नहीं बढ़ा, जिस अनुपात में अन्य क्षेत्रों में बढ़ा है.उनकी आबादी के अनुपात में भी यह संख्या कम है.  पंचायतों व नगर निकायों में 50 फीसदी आरक्षण की वजह से महिलाओं की राजनीतिक चेतना जरूर बढ़ी है. महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत भी बढ़ा है. राजनीतिक पार्टियों के अपने तर्क हैं. उनका कहना है कि वैसे प्रत्याशियों को ही टिकट दिया जाता है, जिनके जीतने की संभावना ज्यादा रहती है. वैसे सैंद्धांतिक रूप से सभी पार्टियां महिला अधिकारों की बातें जरूर करती हैं. बिहार विधानसभा चुनाव के मौके पर यह जानना प्रासंगिक होगा कि बिहार की राजनीति में कहां खड़ी है आधी आबादी. 


आरके नीरद
बिहार में 1952 से अब तक केवल 242 महिलाएं विधानसभा पहुंच पायीं हैं. अब तक 15 बार विधानसभा का चुनाव हो चुका है और हर दल ने महिला मतदाताओं एवं महिला कार्यकर्ताओं की मदद ली. सभी दलों ने महिलाओं के अधिकारी की वकायत की, लेकिन टिकट देने में सब ने उनकी अनदेखी की. सबसे अधिक 34 महिलाएं 1957 में विधनसभा पहुंचीं थीं. उस इतिहास को दोहराने में 53 साल लगे. दुबारा इतनी संख्या में महिलाओं का विधानसभा पहुंच पाना पिछले चुनाव, 2010 में संभव हो सका. हालांकि महिला विधायकों की यह संख्या भी वर्तमान विधानभा की कुल सदस्य संख्या का महज 14 फीसदी ही है, जबकि बात आधी आबादी की होती रही है. 1997 के बाद अक्तूबर 2005 का ही विधानसभा चुनाव ऐसा रहा, जिसमें चुनाव जीतने वाली महिलाओं की संख्या 25 हुई. बाकी ग्यारह चुनावों में महिला विधायकों की संख्या 20 से नीचे रही.     फरवरी 2005 का चुनाव परिणाम तो महिला सशक्तीकरण और महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने के तमाम सामाजिक-राजनीतिक दावों के गाल पर करारा तमाचा था. उस साल 234 महिलाएं चुनाव मैदान में थीं, लेकिन विधानसभा पहुंचने में केवल तीन को सफलता मिली. बिहार में महिला विधायकों की यह सबसे कम संख्या थी. यानी आजादी के 63 साल और लोकतांत्रिक सफर के 58 साल बाद भी महिलाओं को राज्य विधानसभा में प्रतिनिधित्व का अवसर देने में यह साल सबसे निचले पायदान पर रहा.  दलों की दगावाजी
टिकट देने में महिलाओं की अनदेखी के आरोपों को खारिज करने का राजनीतिक दलों के पास तर्क रहा है. पार्टियां चुनाव जीत सकने वाले को ही उम्मीदवार बनाने की वकालत करती रही हैं. इसके विपरीत जिन सीटों पर दलों ने महिलाओं को पूरी मजबूती से लड़ाया है, वहां उन्होंने अच्छे नतीजे दिये हैं. चुनाव विेषक मानते हैं कि महिलाओं के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी न होने की एक बड़ी वजह महिला उम्मीदवारों के कमी भी है. यह तथ्य 1937 के प्रांतीय सभाओं के चुनाव  में भी देखा गया था. उस चुनाव तक महिलाओं को वोट का अधिकार तो मिल चुका था, लेकिन महिला मतदाताओं की संख्या महज 7.83 प्रतिशत (कुल183335) थी. फिर भी देख गया कि जो चार सीटें पटना, पटना सिटी, मुजफ्फरपुर और भागलपुर महिलाओं के लिए आरक्षित थीं, वहां अन्य क्षेत्रों के मुकाबले महिलाओं ने वोट डालने में ज्यादा उत्साह दिखाया. अब भी आधी से अधिक महिला वोटर अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर रही हैं. पिछले चुनाव में 47.74 प्रतिशत महिलाओं ने वोट किया था. पहले उत्साह, फिर निराशा 
1952 से अब तक राज्य विधानसभा में महिला सदस्यों की संख्या पर तौर करें, शुरु के तीन चुनावों तक स्थिति उत्साहजनक थी, लेकिन बाद के सालों की तसवीर निराश करने वाली है. 1952 में जब पहला चुनाव हुआ था, तब नयी-नयी आजादी को लेकर बड़ा उत्साह था. उस उत्साह में 13 महिलाएं विधायक चुनीं गयीं थीं. 1962 के चुनाव में यह संख्या 34 महिला पहुंची. 1967 के तीसरे चुनाव में 25 महिलाएं विधायक बनीं. 1969 में इस संख्या में बड़ी गिरावट आयी और केवल 10  महिलाएं विधानसभा पहुंच पायीं. यहीं से क्षरण शुरू हुआ और 20वीं सदी के अंतिम चुनाव तक यह संख्या 15 से आगे नहीं बढ़ पायी. 1969 में स्थिति इतनी खराब रही कि कि बिहार में केवल चार महिला विधायक हुईं. छठी विधानसभा में स्थिति थोड़ी सुधरी और यह संख्या 13 तक पहुंची. यही संख्या सातवीं, आठवीं एवं 10वीं विधानसभा में भी रही. नौवीं विधानसभा में यह संख्या 15 हुई थी. 11वीं में घट कर 12 और 12वीं  में फिर से 15  हुई. फरवरी 2005 में हुए 13वें विधानसभा चुनाव के नतीजे ने महिला के खाते में केवल तीन अंक डाले, लेकिन आठ माह बाद, अक्तूबर में हुए चुनाव में इसने 25 के अंक पर छलांग लगायी.  2010 के चुनाव में यह बढ़त बरकार रही और 34 अंक पर जा पहुंचा. पिछड़ों की गोलबंदी में वोट बढ़े, सीटें नहीं
1990 के विधानसभा चुनाव में महिलाओं के मतदान में आठ फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई. 1995 इसमें और इजाफा हुआ. इसे मंडल-राजनीति में पिछड़ों की गोलबंदी का प्रभाव माना गया, लेकिन इससे महिलाओं के विधानसभा में प्रतिनिधित्व की दर नहीं बढ़ी. इसका लाभ पिछड़े वर्ग के पुरुष नेताओं को भले हुआ, महिलाओं को नहीं. विधानसभा में महिलाओं की संख्या में 1985 के मुकाबले 1990 में दो और 1995 में तीन की कमी आयी. 10 सालों में एक भी मुसलिस महिला विधायक नहीं बनी और पिछड़ी जाति की महिला विधायकों की संख्या भी दो-तीन के बीच अटकी रही. 58 सालों के संसदीय इतिहास में केवल आठ मुसलिम महिलाएं विधायक बनीं हैं. अनुसूचित जाति से विधायक बनने वाली महिलाओं की अब तक की संख्या 35 है, जबकि अनुसूचित जनजाति से केवल ग्यारह.मताधिकार देने में भी हुआ विलंब
महिलाओं को मताधिकार देने में भी बिहार पीछे रहा. बिहार लेजिस्लेटिव काउंसिल ने करीब आठ साल के संघर्ष के बाद 1929 में यह अधिकार दिया, जबकि बंगाल में 1925, बंबई व संयुक्त प्रांत में 1923, अमस में 1924 और बंगाल में 1925 ही महिलाओं को यह अधिकार मिल चुका था. राबड़ी देवी : पहली महिला सीएम
हां, एक बात हुई कि बिहार में राबड़ी देवी के रूप में महिला को मुख्यमंत्री बनने का अवसर (1997 से 2005 तक तीन बार) मिला, लेकिन इसकी परिस्थिति सामान्य नहीं थी, जैसी कि देश में अन्य 13 महिलाओं के मुख्यमंत्री बनने की रही.  
बिहार विस में महिलाएं
वर्ष कुल मुसलिम अजा अजजा
1952 13 0 1 01957 34 1 3 11962 25 1 5 01967 10 0 3 01969 4 0 1 01972 13 2 01977 13 0 2 11980 13 1 0 11985 15 1 1 11990 13 0 2 21995 12 0 3 32000 15 0 4 2फरवरी, 05 3 0 1 0अक्तूबर, 05 25 0 5 02010 34 2 4 0
प्रकाशित : प्रभात खबर, 17 अगस्त 2015

जनसंघ से भाजपा तक का सियासी सफर


बिहार में जनसंघ से लेकर भाजपा का सियासी सफर दिलचस्प रहा है. आजादी के बाद हुए पहले आम और दूसरे आम चुनाव में जनसंघ का कोई उम्मीदवार तो नहीं जीत पाया था, पर उसने राजनैतिक परिदृश्य पर अपनी मौजूदगी जता दी थी. तीसरे आम चुनाव में न सिर्फ उसके तीन उम्मीदवार विधानसभा पहुंचे, बल्कि उसके वोट प्रतिशत में भी इजाफा हुआ. गौर करने वाली बात यह भी रही कि क्रमिक रूप से उसके वोट प्रतिशत में इजाफा होता गया.यह  सामाजिक स्तर पर उसकी निरंरता का संकेत है. 1967 में संविद सरकार और 1977 की जनता पार्टी सरकार में वह हिस्सेदार रही. 1980 में भाजपा के बनने के बाद उसका सियासी सफर नये आकार में शुरू हुआ. राजनैतिक सफर में ज्यादातर वक्त तक प्रतिपक्ष में रही यह पार्टी 2005 से जून 2012 तक जदयू के साथ सरकार में साझीदार रही. 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य से उसके 21 सांसद चुने गये. यह अब तक का उसका उम्दा प्रदर्शन है.

आरके नीरद
बिहार में भाजपा की चुनावी यात्र दिलचस्प है. शुरू के पच्चीस साल यह जनसंघ के रूप में रही. बीस साल का सफर इस ने अविभाजित बिहार में तय किया. 1980 से 1995 तक का चुनावी सफर इस ने अकेले तय किया. करीब 17 साल गंठबंधन की राजनीतिक की. अब नये गंठबंधन की राह पर है. पिछले गंठबंधन में वह छोटी पार्टी थी. इस बार उसकी भूमिका बड़े घटक दल की है. जनसंघ के रूप में उसकी बिहार विधानसभा की यात्र 1962 से शुरू हुई, जब उसके तीन उम्मीदवार चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे. विस में जनसंघ का यह प्रवेश एक दशक के संघर्ष के बाद संभव हुआ. 1952 और 1957 के विधानसभा चुनाव में उसे कोई सफलता नहीं मिली थी. यह वह दौर था, जब कांग्रेस की लोकप्रियता चरम पर थी. उसे चुनौती देने वाली वही पार्टियां आगे आ पायी थीं, जिन्होंने सामाजिक विषमता का सवाल उठा कर जनता को गोलबंद किया. इनमें सोशलिस्ट पार्टी के बाद सबसे ज्यादा प्रभारी जयपाल सिंह की झारखंड पार्टी और छोटानागपुर-संताल परगना जनता पार्टी थीं. आगे चल कर ये पार्टियां सिमट गयीं और उन्हीं आदिवासी इलाकों में भाजपा की जमीन मजबूत होती गयी. 1962 से 1972 के बीच हालात कुछ बदले. राज्य की राजनीति में उसका हस्तक्षेप बढ़ा. 1967 में उसने 272 सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर 26 सीटें जीतीं. 1969 में उसने 303 सीटों पर दावा किया. उसे 34 सीटों पर जीत मिली. लेकिन 1971 के चुनाव में उसे नौ सीटों का नुकसान हुआ. 1977 के चुनाव में भी इसके नेता चुनाव मैदान में उतरे और 65 सीटों पर उनकी जीत हुई, लेकिन तब जनसंघ जनता पार्टी के साथ था और टिकट जनता पार्टी की ही थी. 
नया कलेवर
गैर कांग्रेसी पार्टियों के बड़े राजनीतिक प्रयोग के तौर पर जनता पार्टी के विफल होने के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आयी. तब नाम और पार्टी संविधान भले नये थे, उसकी राजनीतिक जमीन पुरानी थी. लिहाजा उस जमीन पर वोटों की उसने अच्छी फसल उगायी. इस चुनाव में उसने 246 स्थानों पर उम्मीदवार खड़े किये और 21 सीटें जीतीं. इनमें से 12 सीटें दक्षिण बिहार में थीं. उसके 173 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई और 8.41 फीसदी मत मिले. भाजपा का यह प्रदर्शन जनता पार्टी में टूट के बाद बनीं अन्य दो पार्टियों जनता पार्टी (जेपी) और जनता पार्टी (सेक्यूलर) राजनारायण तथा मूल जनता पार्टी से बेहतर रहा. इस चुनाव में जेपी (जेपी) को 13 तथा राजनारायण की जेपी (सेक्यूलर) को  एक सीट मिली थी. जनता पार्टी के दोनों उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी थी, लेकिन 1985 के विस चुनाव में भाजपा को पांच सीटों का नुकसान हुआ. उसने 234 सीटों पर दावा किया था, लेकिन केवल 16 सीटें मिलीं. वोट प्रतिशत  8.41 से घट कर 7.54 फीसदी रह गया. इसके उलट, 1990 में उसे बड़ी सफलता मिली. उसने 39 सीटें जीतीं. उसे 23 सीटों का फायदा हुआ. वोट प्रतिशत में भी इजाफा हुआ और जमानत बचाने वालों संख्या भी बढ़ी. उसे 11.61 फीसदी वोट मिले. 234 में से केवल 135 की जमानत जब्त हुई. यह राजद और कांग्रेस के बाद तीसरी बड़ी पार्टी बनी, लेकिन  धारा 370, समान नागरिकता, हिंदुत्व और राम मंदिर जैसे बड़े मुद्दों को उठाने के बाद भी भाजपा को वह बढ़त नहीं मिल पा रही थी, जिसकी उसे अपेक्षा थी. यहां तक कि आडवाणी की रथयात्र और बाबरी मसजिद जैसी घटना के बाद भी 1995 के विस में उसे केवल दो सीटों का फायदा हुआ. उसकी सदस्य संख्या 39 से बढ़ कर 41 हुई. 
गंठबंधन की राजनीति
1980 से 1995 तक भाजपा बिहार में अपने बल पर बढ़ती रही. 1995 के चुनाव में तमाम संभावनाओं और प्रयासों के बावजूद जब उसे बड़ी सफलता नहीं मिली, तब उसने समता पार्टी के साथ गंठबंधन की राजनीतिक पारी शुरू की. उसका यह प्रयोग सफल रहा. 2000 के चुनाव में उसने 168 सीटों पर प्रत्याशी दिये और 67 सीटें जीतीं.  वोट प्रतिशत में 8.04 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. 
राज्य विभाजन का नुकसान
बिहार विभाजन का भाजपा को झारखंड में भले लाभ मिला, बिहार में उसे बड़ा नुकसान हुआ. 2000 में  उसके 67 विधायक थे. विभाजन के बाद 32 विधायक झारखंड में चले गये. इस तरह बिहार विस में उसकी सदस्य संख्या महज 35 रह गयी, जबकि जदयू और समता पार्टी की सदस्य संख्या क्रमश: 18 और 29 रही. विलय के बाद बिहार विस में उनकी सदस्य संख्या 47 हुई. लिहाजा भाजपा की जगह जदयू मुख्य विपक्षी पार्टी बना और इसके विधायक दल के नेता को प्रतिपक्ष के नेता का दर्जा मिल गया. 
नयी सदी का नया सफर
नयी सदी में बिहार विधानसभा का पहला चुनाव फरवरी 2005 और दूसरा अक्तूबर 2005 में हुआ. इन चुनावों में भाजपा का जदयू से गंठबंधन कायम रहा.  फरवरी 2005 के चुनाव में वह 103 सीटों पर लड़ी और उसे 37 सीटें मिलीं. यानी दो सीटों का फायदा हुआ. अक्टूबर के चुनाव में  उसने 55 सीटों पर कब्जा किया. यह राज्य विभाजन के बाद हुए नुकसान की बड़ी भरपाई थी. उसने 2000 के मुकाबले 20 सीटों की बढ़त ली. 2010 के चुनाव में भी उसने 91 सीटें जीतीं. 
सत्ता का गलियारा
भाजपा ने 1990 में लालू प्रसाद सरकार को थोड़े समय के लिए बाहर से समर्थन दिया था.सत्ता में भागीदारी 1967 में सविद सरकार और 1977 में जनता पार्टी की सरकारों के बाद  2005 में  नीतीश सरकार में रही. यह सिलसिला जून 2013 तक चला. तब उसके 11 मंत्री थे. भाजपा की गंठंबंधन की राजनीति का अब दूसरा दौर शुरू हुआ है. 2014 में लोजपा, रालोसपा के साथ वह लोकसभा का चुनाव लड़कर ऐतिहासिक जीत दर्ज कर चुकी है. विधानसभा चुनाव में हिन्दुस्तानी अवाम मोरचा भी उसके साथ है. 


बिहार विस चुनावों में जनसंघ-भाजपा
वर्ष उम्मीदवार जीते प्राप्त मत }
1952 0 0 1.2
1957 0 0 1.3
1962 75 3 2.64
1967 272 26 10.35
1969 303 34 15.63
1972 271 25 11.65
1980 244 21 8.41
1985 239 15 7.50
1990 233 39 11.43
1995 31.5 41 12.96
2000 168 67 21.00
फरवरी, 05 103 37 10.7
अक्तूबर, 05 102 55 15.65
2010 102 91 16.46

्रप्रकाशित : प्रभात खबर 11 अगस्त 2015

कूकर की सीटी – आर०के० नीरद (मुख्य उप संपादक पंचायतामा ,प्रभात खबर)

एक साल दस दिन होटल में खाना खाने के बाद मैं पक्के तौर पर यह बता सकता हूं कि वजन घटाने और मोटापा दूर करने की इससे अचूक विधा कोई और नहीं. लिहाजा जब पूरी तरह हल्का और चीपटा हो गया, तब तय किया कि अब चाहे जैसे भी हो, खुद खाना पकाऊंगा और खाऊंगा. इस संकल्प को पूरा करने में भले थोड़ा वक्त लगा, मगर अंतत: खाना बनना शुरू हो गया. पहली रात हलुआ बना. लाजवाब. ऐसा हलुआ आपने कम-से-कम देखा तो नहीं होगा. देखा मैंने भी नहीं था. चखने पर यकीन हुआ हलुआ ही है. मन मिठास से और पेट हलुए से भर गया. रात भर बड़ी अच्छी नींद आयी. नींद में भी हलुआ आया. पूड़ी आयी. दाल, भात और तरकारी आये. पूरी रात बड़ी मस्त बीती.
सुबह जो कुछ बनाना-खाना था, वह बनाया-खाया. बारी आयी रात की. अखबार के दफ्तर में नौकरी का एक बड़ा फयादा है. जब शहर सो रहा होता है, तब आप घर लौट रहे होते हैं. आप पैदल लौट रहे हैं या किसी सवारी-ववारी से, यह कोई नहीं देखता. सड़कों की रखवाली करने वाले कुत्ते भी कुछ ही दिनों में आपको पहचान लेते हैं. पहचान ऐसी बन जाती है कि  आपको देखकर भौंकने-गुर्राने की औपचारिकता भी नहीं रह जाती है. यानी कोई टोका-टोकी करने वाला भी नहीं होता. कभी-कभी ऐसा होता है कि आप दफ्तार से सोमवार की रात निकलते हैं. किलो-दो किलोमीटर दूर अपने घर पहुंचते हैं, तो मंगलवार हो चुका होता है. यानी एक पैर सोमवार में और दूसरा मंगलवार में. इस जीवन को जीने का अपना ही सुख है, जिस पर लाख दलील देने और कसमें खाने के बाद भी कोई भला आदमी यकीन नहीं कर सकता. वह आपसे सहानुभूति रख सकते हैं, मगर आपके इस सुख की गवाही नहीं दे सकता.
बरहाल, ऐसे ही सुख को जीता हुआ जब मैं घर पहुंचा, तो दिन और तारीख दोनों एक-एक डेग आगे खिसक चुके थे. पूरा मुहल्ला ऐसी खामोशी में लिपटा-सिमटा था, जैसे शहर का कोई कोना न होकर मैच खत्म होने के बाद का क्रिकेट मैदान हो. पिछली रात के हलुए शक्ल  अब भी दिलो-दिमाग पर छायी थी. सो, चूल्हे पर कूकर रख कर भात बनाने को जी आया. कुछ देर बाद कूकर ने जोर की सीटी मारी, तो रात थर्रा उठी. मुहल्ले की नि:शब्दता कांपने लगी. वह ही एक नहीं, तीन-तीन बार!
इसका असर सुबह पता चला. हमारे पड़ोसी कामेश्वर जी को सबेरे-सबेरे ट्रेन पकड़नी थी. कूकर की सीटी सुनी, तो हड़बड़ा कर जागे और सीधा बाथरूम भागे. लगा दिन निकल आया है और ट्रेन छूट गयी है. रूप्पन की दादी ने बिस्तर छोड़ दिया और ठंड की परवाह किये बिना अपनी आदत के मुताबिक नहा-धुआ कर अपने कान्हा जी को जगाने जा पहुंचीं. गुप्ता जी की बेटी इस साल इंटर का इंतहान देगी. झटपट उठी और मनोविज्ञान के सवालों को याद करने बैठ गयी. उसका संकल्प था, घंटे भर बाद जब तक मां जगेगी, तब तक वह दो सवालों के जवाब याद कर चुकी होगी, मगर दो घंटे बाद भी जब कहीं से खटर-पटर की कोई आवाज नहीं आयी, तो उसे ताज्जुब हुआ. घड़ी देखी. ढ़ाई बज रहे थे. दूसरी घड़ी देखी. पहली घड़ी से कुछ सेकेंट का विरोध रखते हुए उसने भी यही बताया. झक मार कर वह सो गयी. नींद टूटी, तो दिन के नौ बज रहे थे. वह घोर निराशा में डूब गयी. उसने मान लिया कि इस बार भी नतीजा अच्छा नहीं रहेगा, मगर इस बार ऐसा होने की वजह बदली-बदली होगी. उसे पिछले दो साल से यह यकीन था कि भले परीक्षा इंटर की हो, सवालों का उसका जवाब एमए स्तर का होता है. अब चूंकि कॉपी जांचने वाले गुरुजी इंटर स्तर के शिक्षक होते हैं, सो एमए स्तर का जवाब उनकी समझ में नहीं आता. इसलिए वे सही-सही नंबर नहीं दे पाते. उनके प्रति उसे गुस्सा नहीं, सहानुभूति थी और इस सहानुभूति में उसने इस बार अपना स्टैंडर बड़ी मेहनत के बाद इंटर स्तर का घटाया था, मगर मेरे कूकर ने उसकी मेहनत पर सीटी मार दी. ऐसा न होता, तो मां के जगने तक जाने वह कितने सवालों को याद कर चुकी होती, जो उसे अच्छे नंबर ही नहीं दिलाने, कॉलेज में अब्बल भी बना देते.
खैर. दूसरी रात भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ. अगले दिन सबेरे-सबेरे मेरे पड़ोसी और बाकी पड़ोसियों के मुकबाले मेरे ज्यादा करीबी दूबे जी आये. सुखद समाचार लाये. आधी रात को खाना बनाने की तकलीफ से मुझे मुक्त करने आये. अब रात का खाना मेरे घर पहुंचने के पहले मुहल्ले की ओर से पहुंचा देने का मधुर धुन सुनाया. मैं तो गदगद था. सुना था, बेसुरा गाने वाले सुरीले गायकों के मुकाबले ज्यादा सौभाग्यशाली, अमीर और सुखी होते हैं. मुहल्ले भर के लोग उन्हें इसलिए पैसे देते हैं कि वह चौबीस में से एक भी प्रहर अपना राग अलापने की तकलीफ न करे. मेरे मन में आया, अगर ऐसे गायक मिलें, तो मैं उन्हें उनसे बड़ा अपना यह सौभाग्य दिखाऊं.
बहरहाल, उसके बाद से हर रात मेरे खाने में तरह-तरह की चीजें आने लगीं. कभी लिट्टी और चोखा, तो कभी पूड़ी और पनीर की सब्जी. कभी मिर्च और तेल में डुबकी लगाते तले हुए अंड़े, तो कभी मसालों में डूबी-फंसी मुर्गे की टांगें. मैं धन्य-धन्य कर उठता.
हर रात तरह-तरह के लजीज भोजन के सौभाग्य ने मुङो दूबे जी और मुहल्ले के दूसरे लोगों के प्रति कर्तव्यबोध से भर दिया. मैं इस भोजन के पैसे तो नहीं चुका सकता था. किसी के घर जाकर यह नहीं कह सकता था कि आपने मेरे लिए खाना भेजा है, इसके ये पैसे लीजिए. यह अशिष्टता होती. लिहाजा अक्सर तर-तरकारी खरीद लाता और बच्चों के हाथों पड़ोसियों के घर भेज देता. वे भी सहज भाव से इसे स्वीकार कर लेते. फिर बच्चों का खयाल आया. उनके लिए डार्क फैंटासी और डेलिसस जैसे थोड़े महंगे बिस्किट लाने लगा. बच्चे बड़े आदर से उसे ग्रहण और मुङो कृतार्थ करने लगे. धीरे-धीरे बिस्किट के पैकेट और सब्जी के झोले के आकार और वजन बढ़ने लगे.
मुहल्ले में मेरी कद्र बढ़ गयी थी. जो महिलाएं कल तक मुङो देख कर भी अनदेखा करती थीं, अब सामने से गुजरता देख अपने पल्लू संभालतीं या अपने सर पर आंचल डाल लेतीं. गोया कि मैं मुहल्ले का ऐसा भला मानव हूं कि ऐसा नहीं करना मेरे प्रति उनकी बेअदबी होगी. उन महिलाओं के प्रति मेरी सोच में बड़ा परिवर्तन आया. मैं जब भी उन्हें देखता, मेरे अंदर यह विचार बड़े सम्मान के साथ सर उठाता कि भले ही ये देखने और ओढ़ने-पहनने में जैसी भी हों, पाक कला में उनका कोई मुकाबला नहीं. कभी कोई मेरी कार या मोटरसाइकिल, जिन्हें मैं दूसरों से मांग कर चलाता था, मांग ले जाता, तो उसके देर से लौटने और ज्यादा पेट्रोल खर्च करने पर मेरे मन में हिंसक भाव पैदा नहीं होते. मैंने जोड़ कर देखा. होटल में हर रात का खाना खाने के मुकाबले ये सब्जी, बिस्किट और पेट्रोल काफी सस्ते थे. मेरे दफ्तर में भी इस प्रकरण की चर्चा होती. साथियों ने तीन बातों पर पक्की मुहर लगा दी. एक कि मैं सौभाग्यशाली हूं. दूसरा कि भोजपुर क्षेत्र के लोग खाने-खिलाने के मामले में बड़े अमीर हैं. तीसरा कि मुङो इस मुहल्ले को कभी नहीं छोड़ना चाहिए.
कुल 28 दिन इसी तरह बीते. बीच में चार दिन अपने शहर भी घूम आया. इस तरह बाइस रात मैंने पड़ोसियों के सौजन्य से प्राप्त भोजन ग्रहण किया और हर कौर के साथ इस विश्वास अपने अंदर भरता रहा कि होटल के खाने से जो भी क्षति हुई, उसकी पूरी-पूरी भरपाई हो रही है. मैं फिर से मोटा और वजनी हो रहा हूं.
29वें दिन रात के खाने के साथ एक लिफाफा भी था. मेरा दिल जोर से धड़का. इस शहर में मेरे इस ठिकाने की खबर किसी को न थी. खास कर ऐसे किसी व्यक्ति को, जो पत्र लिख सकता हो. फिर यह यह पत्र कैसा! कौतूहल कम, घबराहट ज्यादा के साथ मैंने लिफाफा खोला. उसमें अनाभ्यस्त लिखावट का मजबून देख कर दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. तभी नींद में डूबी गोल-गोल आंखों और भारी-भारी आवाज के साथ दूबे जी प्रकट हुए. मेरी हैरानी देख कर ऐसे मुस्कुराये, जैसे मैं रंगे हाथों पकड़ा गया.
‘तो पढ़ लिया ना! सांझ को सुमित्र आयी थी. वही यह चिट्ठी रख गयी है. सब ठीक है न !’ – दूबे जी बिना रूके ऐसे बोल गये, जैसे कोई नाटक का संवाद रट कर दुहरा गया हो.
‘मगर ऐसी कोई बात तो थी नहीं?’ – मैं बड़ी मुश्किल से बोल पाया.
‘अजी नहीं कैसे थी? कोई बात नहीं होती, तो आपके नाम यह चिट्टी ही क्यों आती? और भी तो किरायेदार हैं मुहल्ले में! उन्हें तो कोई पत्र नहीं आता!’- दूबे जी झपट कर बोले.
‘आप तो मेरे इतने करीबी हैं. अगर ऐसा कुछ होता, तो आपसे तो इसका जिक्र होता. मैं तो बस यही समझता रहा..’ – मेरा वाक्य अभी अधूरा था. दूबे जी ने उसे पूरा होने का जरा भी मौका नहीं दिया. बाले,‘जिक्र भला होती कैसे? आप तो इतने लट्ट थे कि सब्जी और बिस्किट लाते रहे. हमें लगा आपकी रजामंदी है इसमें.’
‘अब क्या करूं?’ – मैंने सहायता पाने की उम्मीद से यह पूछा.
‘करना क्या है? कल सुबह उसका बेटा मुन्ना आयेगा. खुद ही निबट लेगा.’ – दूबे जी मुङो मझदार में छोड़ गये थे. मुन्ना मुङो विलेन दिखने लगा. हाथ में पकड़ी हुई चिट्टी मेरे अंदर घबराहट पैदा कर रही थी. मैंने फिर से उसे देखा. उस पर मेरा ही नाम लिखा था. संदेह की कोई गुंजाइश नहीं थी. बित्ते भर के कागज पर कुछ अंक पसरे हुए थे. साथ में जोड़ और बराबर के चिह्न् भी थे. मुन्ना नुक्कड़ के रेस्टोरेंट का मालिक था. यह चिट्टी बाइस दिन के खाने का बिल था. मैंने एक झटके से जोड़ा. उस पर लिखी रकम इतनी थी, जितनी तीन माह के खाने के बदले मैंने होटल को देकर मुक्ति पायी थी. सर्दी बढ़ने लगी थी. रात आधी बीत चुकी थी. मेरे कानों में कूकर की तेज सीटी बजने लगी. दूबे जी जा चुके थे.
संपर्क ः 
मुख्य उप संपादक
पंचायतामा
प्रभात खबर, 9431177865,  ई-मेल ः- niradrk@gmail.com 

कूकर की सीटी – आर०के० नीरद (मुख्य उप संपादक पंचायतामा ,प्रभात खबर)

एक साल दस दिन होटल में खाना खाने के बाद मैं पक्के तौर पर यह बता सकता हूं कि वजन घटाने और मोटापा दूर करने की इससे अचूक विधा कोई और नहीं. लिहाजा जब पूरी तरह हल्का और चीपटा हो गया, तब तय किया कि अब चाहे जैसे भी हो, खुद खाना पकाऊंगा और खाऊंगा. इस संकल्प को पूरा करने में भले थोड़ा वक्त लगा, मगर अंतत: खाना बनना शुरू हो गया. पहली रात हलुआ बना. लाजवाब. ऐसा हलुआ आपने कम-से-कम देखा तो नहीं होगा. देखा मैंने भी नहीं था. चखने पर यकीन हुआ हलुआ ही है. मन मिठास से और पेट हलुए से भर गया. रात भर बड़ी अच्छी नींद आयी. नींद में भी हलुआ आया. पूड़ी आयी. दाल, भात और तरकारी आये. पूरी रात बड़ी मस्त बीती.
सुबह जो कुछ बनाना-खाना था, वह बनाया-खाया. बारी आयी रात की. अखबार के दफ्तर में नौकरी का एक बड़ा फयादा है. जब शहर सो रहा होता है, तब आप घर लौट रहे होते हैं. आप पैदल लौट रहे हैं या किसी सवारी-ववारी से, यह कोई नहीं देखता. सड़कों की रखवाली करने वाले कुत्ते भी कुछ ही दिनों में आपको पहचान लेते हैं. पहचान ऐसी बन जाती है कि  आपको देखकर भौंकने-गुर्राने की औपचारिकता भी नहीं रह जाती है. यानी कोई टोका-टोकी करने वाला भी नहीं होता. कभी-कभी ऐसा होता है कि आप दफ्तार से सोमवार की रात निकलते हैं. किलो-दो किलोमीटर दूर अपने घर पहुंचते हैं, तो मंगलवार हो चुका होता है. यानी एक पैर सोमवार में और दूसरा मंगलवार में. इस जीवन को जीने का अपना ही सुख है, जिस पर लाख दलील देने और कसमें खाने के बाद भी कोई भला आदमी यकीन नहीं कर सकता. वह आपसे सहानुभूति रख सकते हैं, मगर आपके इस सुख की गवाही नहीं दे सकता.
बरहाल, ऐसे ही सुख को जीता हुआ जब मैं घर पहुंचा, तो दिन और तारीख दोनों एक-एक डेग आगे खिसक चुके थे. पूरा मुहल्ला ऐसी खामोशी में लिपटा-सिमटा था, जैसे शहर का कोई कोना न होकर मैच खत्म होने के बाद का क्रिकेट मैदान हो. पिछली रात के हलुए शक्ल  अब भी दिलो-दिमाग पर छायी थी. सो, चूल्हे पर कूकर रख कर भात बनाने को जी आया. कुछ देर बाद कूकर ने जोर की सीटी मारी, तो रात थर्रा उठी. मुहल्ले की नि:शब्दता कांपने लगी. वह ही एक नहीं, तीन-तीन बार!
इसका असर सुबह पता चला. हमारे पड़ोसी कामेश्वर जी को सबेरे-सबेरे ट्रेन पकड़नी थी. कूकर की सीटी सुनी, तो हड़बड़ा कर जागे और सीधा बाथरूम भागे. लगा दिन निकल आया है और ट्रेन छूट गयी है. रूप्पन की दादी ने बिस्तर छोड़ दिया और ठंड की परवाह किये बिना अपनी आदत के मुताबिक नहा-धुआ कर अपने कान्हा जी को जगाने जा पहुंचीं. गुप्ता जी की बेटी इस साल इंटर का इंतहान देगी. झटपट उठी और मनोविज्ञान के सवालों को याद करने बैठ गयी. उसका संकल्प था, घंटे भर बाद जब तक मां जगेगी, तब तक वह दो सवालों के जवाब याद कर चुकी होगी, मगर दो घंटे बाद भी जब कहीं से खटर-पटर की कोई आवाज नहीं आयी, तो उसे ताज्जुब हुआ. घड़ी देखी. ढ़ाई बज रहे थे. दूसरी घड़ी देखी. पहली घड़ी से कुछ सेकेंट का विरोध रखते हुए उसने भी यही बताया. झक मार कर वह सो गयी. नींद टूटी, तो दिन के नौ बज रहे थे. वह घोर निराशा में डूब गयी. उसने मान लिया कि इस बार भी नतीजा अच्छा नहीं रहेगा, मगर इस बार ऐसा होने की वजह बदली-बदली होगी. उसे पिछले दो साल से यह यकीन था कि भले परीक्षा इंटर की हो, सवालों का उसका जवाब एमए स्तर का होता है. अब चूंकि कॉपी जांचने वाले गुरुजी इंटर स्तर के शिक्षक होते हैं, सो एमए स्तर का जवाब उनकी समझ में नहीं आता. इसलिए वे सही-सही नंबर नहीं दे पाते. उनके प्रति उसे गुस्सा नहीं, सहानुभूति थी और इस सहानुभूति में उसने इस बार अपना स्टैंडर बड़ी मेहनत के बाद इंटर स्तर का घटाया था, मगर मेरे कूकर ने उसकी मेहनत पर सीटी मार दी. ऐसा न होता, तो मां के जगने तक जाने वह कितने सवालों को याद कर चुकी होती, जो उसे अच्छे नंबर ही नहीं दिलाने, कॉलेज में अब्बल भी बना देते.
खैर. दूसरी रात भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ. अगले दिन सबेरे-सबेरे मेरे पड़ोसी और बाकी पड़ोसियों के मुकबाले मेरे ज्यादा करीबी दूबे जी आये. सुखद समाचार लाये. आधी रात को खाना बनाने की तकलीफ से मुझे मुक्त करने आये. अब रात का खाना मेरे घर पहुंचने के पहले मुहल्ले की ओर से पहुंचा देने का मधुर धुन सुनाया. मैं तो गदगद था. सुना था, बेसुरा गाने वाले सुरीले गायकों के मुकाबले ज्यादा सौभाग्यशाली, अमीर और सुखी होते हैं. मुहल्ले भर के लोग उन्हें इसलिए पैसे देते हैं कि वह चौबीस में से एक भी प्रहर अपना राग अलापने की तकलीफ न करे. मेरे मन में आया, अगर ऐसे गायक मिलें, तो मैं उन्हें उनसे बड़ा अपना यह सौभाग्य दिखाऊं.
बहरहाल, उसके बाद से हर रात मेरे खाने में तरह-तरह की चीजें आने लगीं. कभी लिट्टी और चोखा, तो कभी पूड़ी और पनीर की सब्जी. कभी मिर्च और तेल में डुबकी लगाते तले हुए अंड़े, तो कभी मसालों में डूबी-फंसी मुर्गे की टांगें. मैं धन्य-धन्य कर उठता.
हर रात तरह-तरह के लजीज भोजन के सौभाग्य ने मुङो दूबे जी और मुहल्ले के दूसरे लोगों के प्रति कर्तव्यबोध से भर दिया. मैं इस भोजन के पैसे तो नहीं चुका सकता था. किसी के घर जाकर यह नहीं कह सकता था कि आपने मेरे लिए खाना भेजा है, इसके ये पैसे लीजिए. यह अशिष्टता होती. लिहाजा अक्सर तर-तरकारी खरीद लाता और बच्चों के हाथों पड़ोसियों के घर भेज देता. वे भी सहज भाव से इसे स्वीकार कर लेते. फिर बच्चों का खयाल आया. उनके लिए डार्क फैंटासी और डेलिसस जैसे थोड़े महंगे बिस्किट लाने लगा. बच्चे बड़े आदर से उसे ग्रहण और मुङो कृतार्थ करने लगे. धीरे-धीरे बिस्किट के पैकेट और सब्जी के झोले के आकार और वजन बढ़ने लगे.
मुहल्ले में मेरी कद्र बढ़ गयी थी. जो महिलाएं कल तक मुङो देख कर भी अनदेखा करती थीं, अब सामने से गुजरता देख अपने पल्लू संभालतीं या अपने सर पर आंचल डाल लेतीं. गोया कि मैं मुहल्ले का ऐसा भला मानव हूं कि ऐसा नहीं करना मेरे प्रति उनकी बेअदबी होगी. उन महिलाओं के प्रति मेरी सोच में बड़ा परिवर्तन आया. मैं जब भी उन्हें देखता, मेरे अंदर यह विचार बड़े सम्मान के साथ सर उठाता कि भले ही ये देखने और ओढ़ने-पहनने में जैसी भी हों, पाक कला में उनका कोई मुकाबला नहीं. कभी कोई मेरी कार या मोटरसाइकिल, जिन्हें मैं दूसरों से मांग कर चलाता था, मांग ले जाता, तो उसके देर से लौटने और ज्यादा पेट्रोल खर्च करने पर मेरे मन में हिंसक भाव पैदा नहीं होते. मैंने जोड़ कर देखा. होटल में हर रात का खाना खाने के मुकाबले ये सब्जी, बिस्किट और पेट्रोल काफी सस्ते थे. मेरे दफ्तर में भी इस प्रकरण की चर्चा होती. साथियों ने तीन बातों पर पक्की मुहर लगा दी. एक कि मैं सौभाग्यशाली हूं. दूसरा कि भोजपुर क्षेत्र के लोग खाने-खिलाने के मामले में बड़े अमीर हैं. तीसरा कि मुङो इस मुहल्ले को कभी नहीं छोड़ना चाहिए.
कुल 28 दिन इसी तरह बीते. बीच में चार दिन अपने शहर भी घूम आया. इस तरह बाइस रात मैंने पड़ोसियों के सौजन्य से प्राप्त भोजन ग्रहण किया और हर कौर के साथ इस विश्वास अपने अंदर भरता रहा कि होटल के खाने से जो भी क्षति हुई, उसकी पूरी-पूरी भरपाई हो रही है. मैं फिर से मोटा और वजनी हो रहा हूं.
29वें दिन रात के खाने के साथ एक लिफाफा भी था. मेरा दिल जोर से धड़का. इस शहर में मेरे इस ठिकाने की खबर किसी को न थी. खास कर ऐसे किसी व्यक्ति को, जो पत्र लिख सकता हो. फिर यह यह पत्र कैसा! कौतूहल कम, घबराहट ज्यादा के साथ मैंने लिफाफा खोला. उसमें अनाभ्यस्त लिखावट का मजबून देख कर दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. तभी नींद में डूबी गोल-गोल आंखों और भारी-भारी आवाज के साथ दूबे जी प्रकट हुए. मेरी हैरानी देख कर ऐसे मुस्कुराये, जैसे मैं रंगे हाथों पकड़ा गया.
‘तो पढ़ लिया ना! सांझ को सुमित्र आयी थी. वही यह चिट्ठी रख गयी है. सब ठीक है न !’ – दूबे जी बिना रूके ऐसे बोल गये, जैसे कोई नाटक का संवाद रट कर दुहरा गया हो.
‘मगर ऐसी कोई बात तो थी नहीं?’ – मैं बड़ी मुश्किल से बोल पाया.
‘अजी नहीं कैसे थी? कोई बात नहीं होती, तो आपके नाम यह चिट्टी ही क्यों आती? और भी तो किरायेदार हैं मुहल्ले में! उन्हें तो कोई पत्र नहीं आता!’- दूबे जी झपट कर बोले.
‘आप तो मेरे इतने करीबी हैं. अगर ऐसा कुछ होता, तो आपसे तो इसका जिक्र होता. मैं तो बस यही समझता रहा..’ – मेरा वाक्य अभी अधूरा था. दूबे जी ने उसे पूरा होने का जरा भी मौका नहीं दिया. बाले,‘जिक्र भला होती कैसे? आप तो इतने लट्ट थे कि सब्जी और बिस्किट लाते रहे. हमें लगा आपकी रजामंदी है इसमें.’
‘अब क्या करूं?’ – मैंने सहायता पाने की उम्मीद से यह पूछा.
‘करना क्या है? कल सुबह उसका बेटा मुन्ना आयेगा. खुद ही निबट लेगा.’ – दूबे जी मुङो मझदार में छोड़ गये थे. मुन्ना मुङो विलेन दिखने लगा. हाथ में पकड़ी हुई चिट्टी मेरे अंदर घबराहट पैदा कर रही थी. मैंने फिर से उसे देखा. उस पर मेरा ही नाम लिखा था. संदेह की कोई गुंजाइश नहीं थी. बित्ते भर के कागज पर कुछ अंक पसरे हुए थे. साथ में जोड़ और बराबर के चिह्न् भी थे. मुन्ना नुक्कड़ के रेस्टोरेंट का मालिक था. यह चिट्टी बाइस दिन के खाने का बिल था. मैंने एक झटके से जोड़ा. उस पर लिखी रकम इतनी थी, जितनी तीन माह के खाने के बदले मैंने होटल को देकर मुक्ति पायी थी. सर्दी बढ़ने लगी थी. रात आधी बीत चुकी थी. मेरे कानों में कूकर की तेज सीटी बजने लगी. दूबे जी जा चुके थे.
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 राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चंपारण सत्याग्रह 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1917 से 1918 तक उन्होंने यहां के 31 गांवों की यात्र की थी. इन गांवों में उन्होंने सामुदायिक विकास, शिक्षा और स्वच्छता को लेकर महत्वपूर्ण प्रयोग किये थे, जिनमें राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा निहित थी. इसके महत्व को देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद के शब्दों में हम समझ सकते हैं :
‘सत्याग्रह और असहयोग के संबंध में जो कुछ महात्मा गांधी ने 1920 से 1922 ई0 तक किया, उसका आभास चंपारण के झागड़े में ही मिल चुका था. दक्षिण अिफ्रका से लौट कर महात्मा गांधी ने महत्व का जो पहला काम किया था, वह चंपारण में ही किया था. उस समय भारतवर्ष में ‘होमरूल’ का बड़ा शोर था. जब हम महात्मा गांधी जी से कहते थे कि वे उस आंदोलन में चंपारण को भी लगा दें, तब वे यह कहा करते थे कि जो काम चंपारण में हो रहा है, वही ‘होमरूल’ स्थापित कर सकेगा. उस समय देश शायद ही उस कार्य के महत्व को समझता रहा हो, और न हम ही ऐसा समझते थे, पर आज जब कि उस समय की कार्यशैली पर विचार करते हैं और गत तीन-चार वर्षो के राष्ट्रीय इतिहास की ओर ध्यान देते हैं, तब जान पड़ता है कि यह महान आंदोलन जो आज जारी है, चंपारण की घटना का ही एक अत्यंत विस्तृत और विराट रूप है.’
(‘चंपारण में महात्मा गांधी’, लेखक डॉ राजेंद्र प्रसाद, पृष्ठ-5)
वर्तमान में चंपारण
वर्तमान में चंपारण दो जिलों बेतिया और मोतीहारी में विभाजित है.

महात्मा गांधी की चंपरण के गांवों की यात्र
महात्मा गांधी निलहों के अत्याचार से पीड़ित यहां के किसानों को न्याय दिलाने के लिए 15 अप्रैल 2017 को मोतीहारी आये थे और 16 अगस्त 1917 तक यहां के गांवों का दौरा किया था. चंपारण दौरे में महात्मा गांधी के साथ डॉ राजेंद्र प्रसाद, श्री अनुग्रह नारायण सिंह, प्रो कृपलानी जैसी विभूतियां भी थीं. 8 जून 1917 को बापू अपनी धर्मपत्नी और पुत्न को भी बेतिया ले आये थे. चंपारण में बापू की महत्वपूर्ण ग्राम-यात्न का तिथि क्र  म इस प्रकार है :
15.4.1917  :  चडरिहया ( मोतिहारी)
24.4.1917  :  लौकरिया ( मोतिहारी)
27.4.1917  :  मुरलीभरवा व अमोला
30.4.1917  :  कटहरी
15.5.1917  :  ओलहा
16.5.1917  : धोकराहा, सरिसवा
18.5.1917  :  परसौनी
28.7.1917  :  परसा
31.7.1917  : धोकराहा, लोहियरिया
2.8.1917   :  राजपुर
4.8.1917   :  तुरकौलिया
5.8.1917   : राजपुर छतौनी
16.8.1917  : मोतिहारी से पटना (बांकीपुर) के लिए प्रस्थान.
 
शैक्षणिक प्रयोग की आरंभिक प्रयोगशाला
बापू की चंपारण यात्र निलहों और किसानों के झगड़े को निबटाने तथा जांच समिति के समक्ष गांव के लोगों के पक्ष को रखने तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने चंपारण को अपने शैक्षणिक प्रयोग की आरंभिक प्रयोगशाला बनाया. निलहों के अत्याचार के विरुद्ध चंपारण सत्याग्रह (1917) के दौरान गांधी ने अनुभव किया कि शिक्षा के अभाव में अनेक तरह की बुराइयों से जजर्र समाज में राष्ट्रीय पुनर्जागरण या सामाजिक तथा आर्थिक विकास का सपना अधूरा रह जायेगा. उनकी सोच थी कि स्थायी तरह का काम सही ढंग से ग्रामीण शिक्षा के अभाव में असंभव होगा. अतएव किसानों की समस्या की जांच के लिए गठित स्लाई समिति, जिसमें गांधी किसानों का प्रतिनिधित्व करते थे, उस जांच समिति का कार्य पूरा होते ही वे ग्रामीण विद्यालयों की स्थापना संबंधी योजना को मूर्त रूप देने में संलगA हो गये. उनकी अपेक्षा थी कि गांव वाले स्कूल के लिए उपयुक्त स्थान तथा शिक्षकों के आवास और भोजन की जिम्मेवारी निभायेंगे. सुयोग्य एवं समर्पित शिक्षकों की सेवा उपलब्ध कराना कठिन समस्या थी. गांधी जी की दृष्टि में शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता की अपेक्षा नैतिकता अधिक महत्वपूर्ण थी.
उनका ध्यान बंबई प्रांत में प्रार्थना समाज, सर्वेट्स ऑफ इंडिया सोसइटी तथा डेक्कान एजुकेशन सोसाइटी के समर्पित स्वयं सेवकों की ओर गया. स्वयं सेवक शिक्षकों की सेवा प्राप्ति के लिए गांधी जी की सार्वजनिक अपील का बड़ा ही संतोषजनक परिणाम हुआ.  6 नवंबर, 1917 को बंबई प्रांत से शिक्षा प्रेमी एवं सुसंस्कृत कुछ महिलाएं एवं पुरुष स्वयं सेवी शिक्षकों के साथ गांधी जी चंपारण लौटे. स्वाभाविक था कि निलहों ने ग्रामीणों में शिक्षा के प्रसार के उनके प्रयास को सहयोग और समर्थन देने से मना कर दिया.
तब पूर्वी चंपारण (वर्तमान मोतिहारी) में ढाका के निकट बड़हरवा लखनसेन के उदार दानदाता श्री शिवगुलाम लाल ने अपना मकान प्राथमिक विद्यालय के संचालन के लिए गांधी जी को सौंप दिया और गांव वालों ने अन्य प्रकार की सहायता और सहयोग के लिए  विश्वास दिलाया.

चंपारण में तीन विद्यालयों की स्थापना 
फलत: गांधीजी ने 14 नवंबर 1917 को बड़हरवा लखनसेन में प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई का शुभारंभ कराया. यूरोपियन प्रशिक्षण प्राप्त प्रख्यात इंजीनियर श्री बबन गोखले एवं उनकी पत्नी श्रीमती अवंतिका बाई गोखले जो सुशिक्षित शिक्षिका एवं प्रशिक्षित नर्स थी, की सेवाएं शिक्षण कार्य के लिए उपलब्ध करायी गयी.
महात्मा गांधी ने दूसरी प्राथमिक पाठशाला की स्थापना 20 नवंबर 1917 को भितहरवा गांव में की थी. यह बेतिया से लगभग 40 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है.  यहां कस्तूरबा गांधी ने भी योगदान किया था. उस विद्यालय के संचालन के लिए बेलगांव के सार्वजनिक कार्यकर्ता श्री सदाशिव लक्ष्मण सोमन, अनुभवी चिकित्सक तथा सर्जन डॉ देव के सहायक शिक्षक श्री बालकृष्ण योगेश्वर पुरोहित, श्रीमती कस्तूरबा गांधी तथा तीन अन्य स्वयं सेवकों की सेवाएं उपलब्ध करायी गयीं.
यहां एक प्रसंग का उल्लेख समीचीन है, जिससे यह ज्ञात होता है कि शिक्षा के प्रसार के लिए महात्मा गांधी के सहयोगियों में किस प्रकार का समर्पण भाव और दायित्व बोध था. एक रात इस विद्यालय में आग लगी गयी. फूस का घर था. जल कर राख को गया. तब विद्यालय के संचालक डॉक्टर देव ने अपने सहकर्मियों के साथ स्वयं ही अपने सिर पर ईंट और अन्य निर्माण सामग्री उठा कर जमा किया और जल्द-से-जल्द विद्यालय का पक्का भवन बनवा दिया.  उन्होंने सहयोग के लिए ग्रामीणों को भी प्रेरित किया. यह राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों और शिक्षण संस्थानों के संचालकों के उन नैतिक मूल्यों को दर्शाता है, जिनकी आज की तिथि में अपने देश को बड़ी आवश्यकता है. मैं समझता हूं कि चंपारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष इसे राष्ट्र के समक्ष तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने का उचित अवसर होगा. डॉ राजेंद्र प्रसाद डॉक्टर देव और उनके साथियों के इस कार्य की बड़ी सराहना की और लिखा :
  ‘भितहरवा विद्यालय भवन डॉक्टर देव के प्रशंसनीय कार्य का स्मारक था.’
 (महात्मा गांधी एंड बिहार: पृष्ठ 32-33)
बापू ने तीसरे प्राथमिक विद्यालय की स्थापना 17 जनवार 1918 को मधुबन में की. इस इस पाठशाला में लगभग 100 से अधिक बच्चे पढ़ते थे.

नारी शिक्षा और स्वावलंबन का प्रयोग
महात्मा गांधी ने नारी शिक्षा और स्वावलंबन को लेकर पहला प्रयोग भी चंपारण में भी किया था. मधुबन में उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए एक अलग पाठशाला खोली थी. इसकी अध्यक्ष श्रीमती आनंदी बाई थीं. यहां 40 लड़कियां शिक्षा पाती थीं. यहां लड़कियों  को कपड़ा बुनने और सफाई करने का प्रशिक्षण भी दिया जाता था.
तीनों विद्यालय आश्रम की तरह  संचालित किये जाते थे. उनका व्यापक शैक्षणिक प्रभाव आसपास के गांवों पर  भी पड़ा और सामाजिक पुनर्जागरण की भावना का संचार हुआ.
 इस प्रयोग के दूरगामी चर्चा करते हुए डॉ राजेंद्र प्रसाद ने इस पर स्पष्ट दृष्टि डाली :
  ‘बुनियादी विद्यालयों का प्रभाव केवल छात्रों पर ही नहीं, बल्कि वहां  के आसपास में रहन वाले पर भी पड़ा, यहां तक कि इन गांवों की परदा में रहने वाली स्त्रियां भी इस लाभ से वंचित नहीं रहीं.’
(चंपारण में महात्मा गांधी : डॉ राजेंद्र प्रसाद)  
इस प्रकार महात्मा गांधी ने चंपारण में तीन विद्यालयों की स्थापना की :
13 नवंबर 1917 : बड़हरवा लखनसेन (मोतीहारी से 20 मील पूर्व में ढाका के निकट).
20 नवंबर 1917 : भितहरवा बेतिया से 40 मील पश्चिम).
17 जनवरी 1918 : मधुबन.

महात्मा गांधी ने शिक्षा पद्धति को लेकर भी अपना दृष्टिकोण यहीं प्रकट किया था. उन्होंने शिक्षा संबंधी अपने शैक्षणकि प्रयोग के क्र  म में चंपारण के तत्कालीन जिलाधिकारी जेएल मेरीमेन को 19 नवंबर 1917 को पत्र लिखा था. उसमें उन्होंने कहा था :
 ‘आपकी वर्तमान शिक्षा प्रणाली से मैं घबराता हूं. उससे बच्चों के नैतिक  एवं मानवीय विकास करने के बदले, उन्हें कुंठित किया जाता है. वर्तमान प्रणाली की विशेषताओं को ग्रहण करके उसकी जो बुराइयां है, उनसे बचने का प्रयत्न करूंगा.’

 गांधी जी की मान्यता थी कि औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली का जीवन की वास्तविकताओं से कोई संबंध नहीं है. अंगरेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने से भारतीय भाषाओं का विकास बाधित हुआ है. छात्रों के कौशल एवं आध्यात्मिक विकास की ओर ध्यान नहीं देने से सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन के यंत्र के रूप में औपनिवेशिक शिक्षा पूर्ण असफल है. शिक्षा का उद्देश्य मात्र नौकरी पाना रह गया है. नौकरी नहीं मिलने पर स्वावलंबन की क्षमता के अभाव के चलते पढ़े-लिखे लोग असमाजिक कार्यो में संलिप्त हो जाते हैं.
(महात्मा गांधी एंड बिहार : बीबी मिश्र, 1963)
बापू ने चंपारण में ही अपने शिक्षा दर्शन को प्रकट किया था, जिसमें कहा था कि औपनिवेशिक शिक्षा की दूसरी प्रमुख कमजोरी यह थी कि उसके पाठ्यक्र  मों में मानवीय मूल्यों के विकास का कोई स्थान नहीं था. अतएव वह मानवीय मूल्यों से संपन्न सुशिक्षित मानव बल तैयार कने में असफल रही.

स्वच्छता 
महात्मा गांधी ने व्यक्तिगत और सामुदायिक स्वच्छता के सामाजिक अभियान का प्रयोग भी चंपारण की बड़हरवा लखनसेन और भितहरवा पाठशाला के माध्यम से किया था. श्री बबल गोखले द्वारा बापू को भेजा गया बड़हरवा लखनसेन प्राथमिक विद्यालय का प्रगति प्रतिवेदन इसे स्पष्ट करता है. इसमें उन्होंने स्वच्छता अभियान की सफलता के बारे में जानकारी दी गयी :
‘सभी कुओं को स्वच्छ तथा उपयोगी बना दिया गया है. कुओं के समीपस्थ नालियों को हटाना पड़ा है तथा पेशाब करने की गंदी आदतों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है. प्राथमिक शिक्षा और ग्रामीण सफाई के लिए प्रमुख लोगों की समितियां गठित कर दी गयी हैं.’
दूसरा उदाहरण भितहरवा का है.
इस गांव की जलवायु स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं थी. हमेशा किसी-न-किसी बीमारी का प्रकोप रहता था. लड़कों की संख्या कभी 80 से अधिक नहीं हुई. इसकी वजह गंदगी थी. इस विद्यालय के माध्यम से गांव के लोगों को दवा भी दी जाती थी और स्वच्छता का उन्हें पाठ भी पढ़ाया जाता है.
इसे प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ कली किंकर दत्त (1974) ने इस प्रकार देखा :
  ‘शिक्षण कार्यो के साथ स्वच्छता, ग्रामीण स्वास्थ्य की समस्याओं के समाधान तथा सामाजिक संस्कृति में सुधार की ओर भी गांधीवादी शिक्षक समान अभिरुचि रखते थे.’
  (बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास, खंड-1, पृष्ठ 288)

गांधी जी का शिक्षा दर्शन
बापू ने चंपारण में किये गये प्रयोगों को 1937 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उतारा. 22-23 अक्तूबर 1937 में वर्धा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर विमर्श के लिए शिक्षाविदों एवं कांग्रेस शासित प्रदेशों के शिक्षा मंत्रियों का सम्मेलन  महात्मा गांधी की अध्यक्षता में हुई थी. इसमें उनके शिक्षा प्रणाली संबंधी विचारों को स्वीकार किया गया. ये विचार चंपारण के तीन प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना और संचालन के अनुभव पर आधारित थे. इन्हीं विचारों के आधार पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनी और डॉ जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में गठित समिति को पाठ्यक्र म बनाने का दायित्व सौंपा गया था. समिति ने जो पाठ्यक्र म तैयार किया था, उसके विषयों के आयाम वही थे, जिसे हम आज प्रोत्साहित और विकसित करने में लगे हैं. इसमें शिक्षा का उद्देश्य छात्रों का शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक तथा स्वरोजगारोन्मुखी क्षमता का विकास था. तब प्राथमिक शिक्षा के प्रसार के लिए बिहार (वर्तमान झारखंड का भी हिस्सा इसमें शामिल था) में दानदाताओं के सहयोग से लगभग 300 बुनियादी विद्यालयों की स्थापना की गयी थी, जिनमें 25-30 विद्यालय चंपारण में थे.
 गांधी की दृष्टि में आदर्श विद्यालय 
एक आदर्श गांव की आदर्श पाठशाला कैसी हो, इस पर गांधी ने चंपारण के इन तीन स्कूलों को केंद्र में रख कर स्पष्ट विचार व्यक्त किया था, जो हमारी आज की राष्ट्रीय शिक्षा नीति की बुनियाद है :
‘जिन स्कूलों को मैं खोल रहा हूं, उनमें 12 वर्ष से कम उम्र के ही बच्चे लिये जायेंगे. हमारा विचार है कि जितने लड़के मिल सकें, उन्हें सब बातों की शिक्षा दी जाय अर्थात हिंदी या उर्दू  का पूरा ज्ञान और उसी के द्वारा गणित, इतिहास और भूगोल की मोटी-मोटी बातें, विज्ञान के मूल सिद्धांतों का ज्ञान और थोड़ी-सी शिल्पकारी. इसके लिए कोई कटा-छटा कार्यक्र म निश्चित नहीं किया गया है, क्योंकि मैं नयी राह पर चल रहा हूं. आज-कल की परिपाटी को मैं पसंद नहीं करता. बच्चों की मानसिक शक्ति बढ़ाने तथा उनके चरित्र सुधारने के बदले यह परिपाटी उन्हें दबा देती है. उस परिपाटी में जो गुण है, उन्हें मैं ले लूंगा और उनके दुगरुणों से बचने का प्रयत्न करूंगा. हमारा मुख्य उद्देश्य यह है कि बच्चे सुशिक्षित और चरित्रवान पुरुषों और स्त्रियों के संसर्ग में रहें. मैं इसी को शिक्षा कहता हूं. लिखना-पढ़ना भी इसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए सिखाया जायेगा. शिल्पकारी उन लड़कों और लड़कियों को ही सिखायी जायेगी, तो अपने जीवन निर्वाह के एक और भी जरिये के लिए हमारे यहां आवेंगे. मेरा मतलब यह नहीं है कि वे इस प्रकार की शिक्षा पाकर अपना खानदानी पेशा अर्थात गृहस्थी का काम छोड़ दें, बल्कि मेरी इच्छा है कि ये अपनी विद्या को कृषि और कृषकों के जीवन की उन्नति में लगावें. हमारे शिक्षकों का  प्रभाव सयानों पर भी पड़ेगा और यदि हो सका तो वे पर्दे के भीतर भी अपने प्रभाव की पहुंचायेंगे. जवानों की स्वास्थ्य रक्षा का ज्ञान दिया जायेगा और आपस में मिल कर काम करने से क्या लाभ है, यह भी बताया जायेगा. जैसे गांव की सड़कों की मरम्मत करना, कुआं खोदना इत्यादि. जहां तक हो सकेगा, लोगों का मुफ्त इलाज भी किया जायेगा, क्योंकि हमारे सभी शिक्षक चाहे, वह पुरुष हो या स्त्री सुशिक्षित रहेंगे.’
                                                                           (चंपारण में महात्मा गांधी : डॉ राजेंद्र प्रसाद, पृष्ठ 193)