राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चंपारण सत्याग्रह
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1917 से 1918 तक उन्होंने यहां के 31 गांवों की यात्र की थी. इन गांवों में उन्होंने सामुदायिक विकास, शिक्षा और स्वच्छता को लेकर महत्वपूर्ण प्रयोग किये थे, जिनमें राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा निहित थी. इसके महत्व को देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद के शब्दों में हम समझ सकते हैं :‘सत्याग्रह और असहयोग के संबंध में जो कुछ महात्मा गांधी ने 1920 से 1922 ई0 तक किया, उसका आभास चंपारण के झागड़े में ही मिल चुका था. दक्षिण अिफ्रका से लौट कर महात्मा गांधी ने महत्व का जो पहला काम किया था, वह चंपारण में ही किया था. उस समय भारतवर्ष में ‘होमरूल’ का बड़ा शोर था. जब हम महात्मा गांधी जी से कहते थे कि वे उस आंदोलन में चंपारण को भी लगा दें, तब वे यह कहा करते थे कि जो काम चंपारण में हो रहा है, वही ‘होमरूल’ स्थापित कर सकेगा. उस समय देश शायद ही उस कार्य के महत्व को समझता रहा हो, और न हम ही ऐसा समझते थे, पर आज जब कि उस समय की कार्यशैली पर विचार करते हैं और गत तीन-चार वर्षो के राष्ट्रीय इतिहास की ओर ध्यान देते हैं, तब जान पड़ता है कि यह महान आंदोलन जो आज जारी है, चंपारण की घटना का ही एक अत्यंत विस्तृत और विराट रूप है.’
(‘चंपारण में महात्मा गांधी’, लेखक डॉ राजेंद्र प्रसाद, पृष्ठ-5)
वर्तमान में चंपारण
वर्तमान में चंपारण दो जिलों बेतिया और मोतीहारी में विभाजित है.
महात्मा गांधी की चंपरण के गांवों की यात्र
महात्मा गांधी निलहों के अत्याचार से पीड़ित यहां के किसानों को न्याय दिलाने के लिए 15 अप्रैल 2017 को मोतीहारी आये थे और 16 अगस्त 1917 तक यहां के गांवों का दौरा किया था. चंपारण दौरे में महात्मा गांधी के साथ डॉ राजेंद्र प्रसाद, श्री अनुग्रह नारायण सिंह, प्रो कृपलानी जैसी विभूतियां भी थीं. 8 जून 1917 को बापू अपनी धर्मपत्नी और पुत्न को भी बेतिया ले आये थे. चंपारण में बापू की महत्वपूर्ण ग्राम-यात्न का तिथि क्र म इस प्रकार है :
15.4.1917 : चडरिहया ( मोतिहारी)
24.4.1917 : लौकरिया ( मोतिहारी)
27.4.1917 : मुरलीभरवा व अमोला
30.4.1917 : कटहरी
15.5.1917 : ओलहा
16.5.1917 : धोकराहा, सरिसवा
18.5.1917 : परसौनी
28.7.1917 : परसा
31.7.1917 : धोकराहा, लोहियरिया
2.8.1917 : राजपुर
4.8.1917 : तुरकौलिया
5.8.1917 : राजपुर छतौनी
16.8.1917 : मोतिहारी से पटना (बांकीपुर) के लिए प्रस्थान.
शैक्षणिक प्रयोग की आरंभिक प्रयोगशाला
बापू की चंपारण यात्र निलहों और किसानों के झगड़े को निबटाने तथा जांच समिति के समक्ष गांव के लोगों के पक्ष को रखने तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने चंपारण को अपने शैक्षणिक प्रयोग की आरंभिक प्रयोगशाला बनाया. निलहों के अत्याचार के विरुद्ध चंपारण सत्याग्रह (1917) के दौरान गांधी ने अनुभव किया कि शिक्षा के अभाव में अनेक तरह की बुराइयों से जजर्र समाज में राष्ट्रीय पुनर्जागरण या सामाजिक तथा आर्थिक विकास का सपना अधूरा रह जायेगा. उनकी सोच थी कि स्थायी तरह का काम सही ढंग से ग्रामीण शिक्षा के अभाव में असंभव होगा. अतएव किसानों की समस्या की जांच के लिए गठित स्लाई समिति, जिसमें गांधी किसानों का प्रतिनिधित्व करते थे, उस जांच समिति का कार्य पूरा होते ही वे ग्रामीण विद्यालयों की स्थापना संबंधी योजना को मूर्त रूप देने में संलगA हो गये. उनकी अपेक्षा थी कि गांव वाले स्कूल के लिए उपयुक्त स्थान तथा शिक्षकों के आवास और भोजन की जिम्मेवारी निभायेंगे. सुयोग्य एवं समर्पित शिक्षकों की सेवा उपलब्ध कराना कठिन समस्या थी. गांधी जी की दृष्टि में शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता की अपेक्षा नैतिकता अधिक महत्वपूर्ण थी.
उनका ध्यान बंबई प्रांत में प्रार्थना समाज, सर्वेट्स ऑफ इंडिया सोसइटी तथा डेक्कान एजुकेशन सोसाइटी के समर्पित स्वयं सेवकों की ओर गया. स्वयं सेवक शिक्षकों की सेवा प्राप्ति के लिए गांधी जी की सार्वजनिक अपील का बड़ा ही संतोषजनक परिणाम हुआ. 6 नवंबर, 1917 को बंबई प्रांत से शिक्षा प्रेमी एवं सुसंस्कृत कुछ महिलाएं एवं पुरुष स्वयं सेवी शिक्षकों के साथ गांधी जी चंपारण लौटे. स्वाभाविक था कि निलहों ने ग्रामीणों में शिक्षा के प्रसार के उनके प्रयास को सहयोग और समर्थन देने से मना कर दिया.
तब पूर्वी चंपारण (वर्तमान मोतिहारी) में ढाका के निकट बड़हरवा लखनसेन के उदार दानदाता श्री शिवगुलाम लाल ने अपना मकान प्राथमिक विद्यालय के संचालन के लिए गांधी जी को सौंप दिया और गांव वालों ने अन्य प्रकार की सहायता और सहयोग के लिए विश्वास दिलाया.
चंपारण में तीन विद्यालयों की स्थापना
फलत: गांधीजी ने 14 नवंबर 1917 को बड़हरवा लखनसेन में प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई का शुभारंभ कराया. यूरोपियन प्रशिक्षण प्राप्त प्रख्यात इंजीनियर श्री बबन गोखले एवं उनकी पत्नी श्रीमती अवंतिका बाई गोखले जो सुशिक्षित शिक्षिका एवं प्रशिक्षित नर्स थी, की सेवाएं शिक्षण कार्य के लिए उपलब्ध करायी गयी.
महात्मा गांधी ने दूसरी प्राथमिक पाठशाला की स्थापना 20 नवंबर 1917 को भितहरवा गांव में की थी. यह बेतिया से लगभग 40 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है. यहां कस्तूरबा गांधी ने भी योगदान किया था. उस विद्यालय के संचालन के लिए बेलगांव के सार्वजनिक कार्यकर्ता श्री सदाशिव लक्ष्मण सोमन, अनुभवी चिकित्सक तथा सर्जन डॉ देव के सहायक शिक्षक श्री बालकृष्ण योगेश्वर पुरोहित, श्रीमती कस्तूरबा गांधी तथा तीन अन्य स्वयं सेवकों की सेवाएं उपलब्ध करायी गयीं.
यहां एक प्रसंग का उल्लेख समीचीन है, जिससे यह ज्ञात होता है कि शिक्षा के प्रसार के लिए महात्मा गांधी के सहयोगियों में किस प्रकार का समर्पण भाव और दायित्व बोध था. एक रात इस विद्यालय में आग लगी गयी. फूस का घर था. जल कर राख को गया. तब विद्यालय के संचालक डॉक्टर देव ने अपने सहकर्मियों के साथ स्वयं ही अपने सिर पर ईंट और अन्य निर्माण सामग्री उठा कर जमा किया और जल्द-से-जल्द विद्यालय का पक्का भवन बनवा दिया. उन्होंने सहयोग के लिए ग्रामीणों को भी प्रेरित किया. यह राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों और शिक्षण संस्थानों के संचालकों के उन नैतिक मूल्यों को दर्शाता है, जिनकी आज की तिथि में अपने देश को बड़ी आवश्यकता है. मैं समझता हूं कि चंपारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष इसे राष्ट्र के समक्ष तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने का उचित अवसर होगा. डॉ राजेंद्र प्रसाद डॉक्टर देव और उनके साथियों के इस कार्य की बड़ी सराहना की और लिखा :
‘भितहरवा विद्यालय भवन डॉक्टर देव के प्रशंसनीय कार्य का स्मारक था.’
(महात्मा गांधी एंड बिहार: पृष्ठ 32-33)
बापू ने तीसरे प्राथमिक विद्यालय की स्थापना 17 जनवार 1918 को मधुबन में की. इस इस पाठशाला में लगभग 100 से अधिक बच्चे पढ़ते थे.
नारी शिक्षा और स्वावलंबन का प्रयोग
महात्मा गांधी ने नारी शिक्षा और स्वावलंबन को लेकर पहला प्रयोग भी चंपारण में भी किया था. मधुबन में उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए एक अलग पाठशाला खोली थी. इसकी अध्यक्ष श्रीमती आनंदी बाई थीं. यहां 40 लड़कियां शिक्षा पाती थीं. यहां लड़कियों को कपड़ा बुनने और सफाई करने का प्रशिक्षण भी दिया जाता था.
तीनों विद्यालय आश्रम की तरह संचालित किये जाते थे. उनका व्यापक शैक्षणिक प्रभाव आसपास के गांवों पर भी पड़ा और सामाजिक पुनर्जागरण की भावना का संचार हुआ.
इस प्रयोग के दूरगामी चर्चा करते हुए डॉ राजेंद्र प्रसाद ने इस पर स्पष्ट दृष्टि डाली :
‘बुनियादी विद्यालयों का प्रभाव केवल छात्रों पर ही नहीं, बल्कि वहां के आसपास में रहन वाले पर भी पड़ा, यहां तक कि इन गांवों की परदा में रहने वाली स्त्रियां भी इस लाभ से वंचित नहीं रहीं.’
(चंपारण में महात्मा गांधी : डॉ राजेंद्र प्रसाद)
इस प्रकार महात्मा गांधी ने चंपारण में तीन विद्यालयों की स्थापना की :
13 नवंबर 1917 : बड़हरवा लखनसेन (मोतीहारी से 20 मील पूर्व में ढाका के निकट).
20 नवंबर 1917 : भितहरवा बेतिया से 40 मील पश्चिम).
17 जनवरी 1918 : मधुबन.
महात्मा गांधी ने शिक्षा पद्धति को लेकर भी अपना दृष्टिकोण यहीं प्रकट किया था. उन्होंने शिक्षा संबंधी अपने शैक्षणकि प्रयोग के क्र म में चंपारण के तत्कालीन जिलाधिकारी जेएल मेरीमेन को 19 नवंबर 1917 को पत्र लिखा था. उसमें उन्होंने कहा था :
‘आपकी वर्तमान शिक्षा प्रणाली से मैं घबराता हूं. उससे बच्चों के नैतिक एवं मानवीय विकास करने के बदले, उन्हें कुंठित किया जाता है. वर्तमान प्रणाली की विशेषताओं को ग्रहण करके उसकी जो बुराइयां है, उनसे बचने का प्रयत्न करूंगा.’
गांधी जी की मान्यता थी कि औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली का जीवन की वास्तविकताओं से कोई संबंध नहीं है. अंगरेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने से भारतीय भाषाओं का विकास बाधित हुआ है. छात्रों के कौशल एवं आध्यात्मिक विकास की ओर ध्यान नहीं देने से सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन के यंत्र के रूप में औपनिवेशिक शिक्षा पूर्ण असफल है. शिक्षा का उद्देश्य मात्र नौकरी पाना रह गया है. नौकरी नहीं मिलने पर स्वावलंबन की क्षमता के अभाव के चलते पढ़े-लिखे लोग असमाजिक कार्यो में संलिप्त हो जाते हैं.
(महात्मा गांधी एंड बिहार : बीबी मिश्र, 1963)
बापू ने चंपारण में ही अपने शिक्षा दर्शन को प्रकट किया था, जिसमें कहा था कि औपनिवेशिक शिक्षा की दूसरी प्रमुख कमजोरी यह थी कि उसके पाठ्यक्र मों में मानवीय मूल्यों के विकास का कोई स्थान नहीं था. अतएव वह मानवीय मूल्यों से संपन्न सुशिक्षित मानव बल तैयार कने में असफल रही.
स्वच्छता
महात्मा गांधी ने व्यक्तिगत और सामुदायिक स्वच्छता के सामाजिक अभियान का प्रयोग भी चंपारण की बड़हरवा लखनसेन और भितहरवा पाठशाला के माध्यम से किया था. श्री बबल गोखले द्वारा बापू को भेजा गया बड़हरवा लखनसेन प्राथमिक विद्यालय का प्रगति प्रतिवेदन इसे स्पष्ट करता है. इसमें उन्होंने स्वच्छता अभियान की सफलता के बारे में जानकारी दी गयी :
‘सभी कुओं को स्वच्छ तथा उपयोगी बना दिया गया है. कुओं के समीपस्थ नालियों को हटाना पड़ा है तथा पेशाब करने की गंदी आदतों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है. प्राथमिक शिक्षा और ग्रामीण सफाई के लिए प्रमुख लोगों की समितियां गठित कर दी गयी हैं.’
दूसरा उदाहरण भितहरवा का है.
इस गांव की जलवायु स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं थी. हमेशा किसी-न-किसी बीमारी का प्रकोप रहता था. लड़कों की संख्या कभी 80 से अधिक नहीं हुई. इसकी वजह गंदगी थी. इस विद्यालय के माध्यम से गांव के लोगों को दवा भी दी जाती थी और स्वच्छता का उन्हें पाठ भी पढ़ाया जाता है.
इसे प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ कली किंकर दत्त (1974) ने इस प्रकार देखा :
‘शिक्षण कार्यो के साथ स्वच्छता, ग्रामीण स्वास्थ्य की समस्याओं के समाधान तथा सामाजिक संस्कृति में सुधार की ओर भी गांधीवादी शिक्षक समान अभिरुचि रखते थे.’
(बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास, खंड-1, पृष्ठ 288)
गांधी जी का शिक्षा दर्शन
बापू ने चंपारण में किये गये प्रयोगों को 1937 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उतारा. 22-23 अक्तूबर 1937 में वर्धा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर विमर्श के लिए शिक्षाविदों एवं कांग्रेस शासित प्रदेशों के शिक्षा मंत्रियों का सम्मेलन महात्मा गांधी की अध्यक्षता में हुई थी. इसमें उनके शिक्षा प्रणाली संबंधी विचारों को स्वीकार किया गया. ये विचार चंपारण के तीन प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना और संचालन के अनुभव पर आधारित थे. इन्हीं विचारों के आधार पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनी और डॉ जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में गठित समिति को पाठ्यक्र म बनाने का दायित्व सौंपा गया था. समिति ने जो पाठ्यक्र म तैयार किया था, उसके विषयों के आयाम वही थे, जिसे हम आज प्रोत्साहित और विकसित करने में लगे हैं. इसमें शिक्षा का उद्देश्य छात्रों का शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक तथा स्वरोजगारोन्मुखी क्षमता का विकास था. तब प्राथमिक शिक्षा के प्रसार के लिए बिहार (वर्तमान झारखंड का भी हिस्सा इसमें शामिल था) में दानदाताओं के सहयोग से लगभग 300 बुनियादी विद्यालयों की स्थापना की गयी थी, जिनमें 25-30 विद्यालय चंपारण में थे.
गांधी की दृष्टि में आदर्श विद्यालय
एक आदर्श गांव की आदर्श पाठशाला कैसी हो, इस पर गांधी ने चंपारण के इन तीन स्कूलों को केंद्र में रख कर स्पष्ट विचार व्यक्त किया था, जो हमारी आज की राष्ट्रीय शिक्षा नीति की बुनियाद है :
‘जिन स्कूलों को मैं खोल रहा हूं, उनमें 12 वर्ष से कम उम्र के ही बच्चे लिये जायेंगे. हमारा विचार है कि जितने लड़के मिल सकें, उन्हें सब बातों की शिक्षा दी जाय अर्थात हिंदी या उर्दू का पूरा ज्ञान और उसी के द्वारा गणित, इतिहास और भूगोल की मोटी-मोटी बातें, विज्ञान के मूल सिद्धांतों का ज्ञान और थोड़ी-सी शिल्पकारी. इसके लिए कोई कटा-छटा कार्यक्र म निश्चित नहीं किया गया है, क्योंकि मैं नयी राह पर चल रहा हूं. आज-कल की परिपाटी को मैं पसंद नहीं करता. बच्चों की मानसिक शक्ति बढ़ाने तथा उनके चरित्र सुधारने के बदले यह परिपाटी उन्हें दबा देती है. उस परिपाटी में जो गुण है, उन्हें मैं ले लूंगा और उनके दुगरुणों से बचने का प्रयत्न करूंगा. हमारा मुख्य उद्देश्य यह है कि बच्चे सुशिक्षित और चरित्रवान पुरुषों और स्त्रियों के संसर्ग में रहें. मैं इसी को शिक्षा कहता हूं. लिखना-पढ़ना भी इसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए सिखाया जायेगा. शिल्पकारी उन लड़कों और लड़कियों को ही सिखायी जायेगी, तो अपने जीवन निर्वाह के एक और भी जरिये के लिए हमारे यहां आवेंगे. मेरा मतलब यह नहीं है कि वे इस प्रकार की शिक्षा पाकर अपना खानदानी पेशा अर्थात गृहस्थी का काम छोड़ दें, बल्कि मेरी इच्छा है कि ये अपनी विद्या को कृषि और कृषकों के जीवन की उन्नति में लगावें. हमारे शिक्षकों का प्रभाव सयानों पर भी पड़ेगा और यदि हो सका तो वे पर्दे के भीतर भी अपने प्रभाव की पहुंचायेंगे. जवानों की स्वास्थ्य रक्षा का ज्ञान दिया जायेगा और आपस में मिल कर काम करने से क्या लाभ है, यह भी बताया जायेगा. जैसे गांव की सड़कों की मरम्मत करना, कुआं खोदना इत्यादि. जहां तक हो सकेगा, लोगों का मुफ्त इलाज भी किया जायेगा, क्योंकि हमारे सभी शिक्षक चाहे, वह पुरुष हो या स्त्री सुशिक्षित रहेंगे.’
(चंपारण में महात्मा गांधी : डॉ राजेंद्र प्रसाद, पृष्ठ 193)
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