जनसंघ से भाजपा तक का सियासी सफर
बिहार में जनसंघ से लेकर भाजपा का सियासी सफर दिलचस्प रहा है. आजादी के बाद हुए पहले आम और दूसरे आम चुनाव में जनसंघ का कोई उम्मीदवार तो नहीं जीत पाया था, पर उसने राजनैतिक परिदृश्य पर अपनी मौजूदगी जता दी थी. तीसरे आम चुनाव में न सिर्फ उसके तीन उम्मीदवार विधानसभा पहुंचे, बल्कि उसके वोट प्रतिशत में भी इजाफा हुआ. गौर करने वाली बात यह भी रही कि क्रमिक रूप से उसके वोट प्रतिशत में इजाफा होता गया.यह सामाजिक स्तर पर उसकी निरंरता का संकेत है. 1967 में संविद सरकार और 1977 की जनता पार्टी सरकार में वह हिस्सेदार रही. 1980 में भाजपा के बनने के बाद उसका सियासी सफर नये आकार में शुरू हुआ. राजनैतिक सफर में ज्यादातर वक्त तक प्रतिपक्ष में रही यह पार्टी 2005 से जून 2012 तक जदयू के साथ सरकार में साझीदार रही. 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य से उसके 21 सांसद चुने गये. यह अब तक का उसका उम्दा प्रदर्शन है.
आरके नीरद
बिहार में भाजपा की चुनावी यात्र दिलचस्प है. शुरू के पच्चीस साल यह जनसंघ के रूप में रही. बीस साल का सफर इस ने अविभाजित बिहार में तय किया. 1980 से 1995 तक का चुनावी सफर इस ने अकेले तय किया. करीब 17 साल गंठबंधन की राजनीतिक की. अब नये गंठबंधन की राह पर है. पिछले गंठबंधन में वह छोटी पार्टी थी. इस बार उसकी भूमिका बड़े घटक दल की है. जनसंघ के रूप में उसकी बिहार विधानसभा की यात्र 1962 से शुरू हुई, जब उसके तीन उम्मीदवार चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे. विस में जनसंघ का यह प्रवेश एक दशक के संघर्ष के बाद संभव हुआ. 1952 और 1957 के विधानसभा चुनाव में उसे कोई सफलता नहीं मिली थी. यह वह दौर था, जब कांग्रेस की लोकप्रियता चरम पर थी. उसे चुनौती देने वाली वही पार्टियां आगे आ पायी थीं, जिन्होंने सामाजिक विषमता का सवाल उठा कर जनता को गोलबंद किया. इनमें सोशलिस्ट पार्टी के बाद सबसे ज्यादा प्रभारी जयपाल सिंह की झारखंड पार्टी और छोटानागपुर-संताल परगना जनता पार्टी थीं. आगे चल कर ये पार्टियां सिमट गयीं और उन्हीं आदिवासी इलाकों में भाजपा की जमीन मजबूत होती गयी. 1962 से 1972 के बीच हालात कुछ बदले. राज्य की राजनीति में उसका हस्तक्षेप बढ़ा. 1967 में उसने 272 सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर 26 सीटें जीतीं. 1969 में उसने 303 सीटों पर दावा किया. उसे 34 सीटों पर जीत मिली. लेकिन 1971 के चुनाव में उसे नौ सीटों का नुकसान हुआ. 1977 के चुनाव में भी इसके नेता चुनाव मैदान में उतरे और 65 सीटों पर उनकी जीत हुई, लेकिन तब जनसंघ जनता पार्टी के साथ था और टिकट जनता पार्टी की ही थी.
नया कलेवर
गैर कांग्रेसी पार्टियों के बड़े राजनीतिक प्रयोग के तौर पर जनता पार्टी के विफल होने के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आयी. तब नाम और पार्टी संविधान भले नये थे, उसकी राजनीतिक जमीन पुरानी थी. लिहाजा उस जमीन पर वोटों की उसने अच्छी फसल उगायी. इस चुनाव में उसने 246 स्थानों पर उम्मीदवार खड़े किये और 21 सीटें जीतीं. इनमें से 12 सीटें दक्षिण बिहार में थीं. उसके 173 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई और 8.41 फीसदी मत मिले. भाजपा का यह प्रदर्शन जनता पार्टी में टूट के बाद बनीं अन्य दो पार्टियों जनता पार्टी (जेपी) और जनता पार्टी (सेक्यूलर) राजनारायण तथा मूल जनता पार्टी से बेहतर रहा. इस चुनाव में जेपी (जेपी) को 13 तथा राजनारायण की जेपी (सेक्यूलर) को एक सीट मिली थी. जनता पार्टी के दोनों उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी थी, लेकिन 1985 के विस चुनाव में भाजपा को पांच सीटों का नुकसान हुआ. उसने 234 सीटों पर दावा किया था, लेकिन केवल 16 सीटें मिलीं. वोट प्रतिशत 8.41 से घट कर 7.54 फीसदी रह गया. इसके उलट, 1990 में उसे बड़ी सफलता मिली. उसने 39 सीटें जीतीं. उसे 23 सीटों का फायदा हुआ. वोट प्रतिशत में भी इजाफा हुआ और जमानत बचाने वालों संख्या भी बढ़ी. उसे 11.61 फीसदी वोट मिले. 234 में से केवल 135 की जमानत जब्त हुई. यह राजद और कांग्रेस के बाद तीसरी बड़ी पार्टी बनी, लेकिन धारा 370, समान नागरिकता, हिंदुत्व और राम मंदिर जैसे बड़े मुद्दों को उठाने के बाद भी भाजपा को वह बढ़त नहीं मिल पा रही थी, जिसकी उसे अपेक्षा थी. यहां तक कि आडवाणी की रथयात्र और बाबरी मसजिद जैसी घटना के बाद भी 1995 के विस में उसे केवल दो सीटों का फायदा हुआ. उसकी सदस्य संख्या 39 से बढ़ कर 41 हुई.
गंठबंधन की राजनीति
1980 से 1995 तक भाजपा बिहार में अपने बल पर बढ़ती रही. 1995 के चुनाव में तमाम संभावनाओं और प्रयासों के बावजूद जब उसे बड़ी सफलता नहीं मिली, तब उसने समता पार्टी के साथ गंठबंधन की राजनीतिक पारी शुरू की. उसका यह प्रयोग सफल रहा. 2000 के चुनाव में उसने 168 सीटों पर प्रत्याशी दिये और 67 सीटें जीतीं. वोट प्रतिशत में 8.04 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
राज्य विभाजन का नुकसान
बिहार विभाजन का भाजपा को झारखंड में भले लाभ मिला, बिहार में उसे बड़ा नुकसान हुआ. 2000 में उसके 67 विधायक थे. विभाजन के बाद 32 विधायक झारखंड में चले गये. इस तरह बिहार विस में उसकी सदस्य संख्या महज 35 रह गयी, जबकि जदयू और समता पार्टी की सदस्य संख्या क्रमश: 18 और 29 रही. विलय के बाद बिहार विस में उनकी सदस्य संख्या 47 हुई. लिहाजा भाजपा की जगह जदयू मुख्य विपक्षी पार्टी बना और इसके विधायक दल के नेता को प्रतिपक्ष के नेता का दर्जा मिल गया.
नयी सदी का नया सफर
नयी सदी में बिहार विधानसभा का पहला चुनाव फरवरी 2005 और दूसरा अक्तूबर 2005 में हुआ. इन चुनावों में भाजपा का जदयू से गंठबंधन कायम रहा. फरवरी 2005 के चुनाव में वह 103 सीटों पर लड़ी और उसे 37 सीटें मिलीं. यानी दो सीटों का फायदा हुआ. अक्टूबर के चुनाव में उसने 55 सीटों पर कब्जा किया. यह राज्य विभाजन के बाद हुए नुकसान की बड़ी भरपाई थी. उसने 2000 के मुकाबले 20 सीटों की बढ़त ली. 2010 के चुनाव में भी उसने 91 सीटें जीतीं.
सत्ता का गलियारा
भाजपा ने 1990 में लालू प्रसाद सरकार को थोड़े समय के लिए बाहर से समर्थन दिया था.सत्ता में भागीदारी 1967 में सविद सरकार और 1977 में जनता पार्टी की सरकारों के बाद 2005 में नीतीश सरकार में रही. यह सिलसिला जून 2013 तक चला. तब उसके 11 मंत्री थे. भाजपा की गंठंबंधन की राजनीति का अब दूसरा दौर शुरू हुआ है. 2014 में लोजपा, रालोसपा के साथ वह लोकसभा का चुनाव लड़कर ऐतिहासिक जीत दर्ज कर चुकी है. विधानसभा चुनाव में हिन्दुस्तानी अवाम मोरचा भी उसके साथ है.
बिहार विस चुनावों में जनसंघ-भाजपा
वर्ष उम्मीदवार जीते प्राप्त मत }
1952 0 0 1.2
1957 0 0 1.3
1962 75 3 2.64
1967 272 26 10.35
1969 303 34 15.63
1972 271 25 11.65
1980 244 21 8.41
1985 239 15 7.50
1990 233 39 11.43
1995 31.5 41 12.96
2000 168 67 21.00
फरवरी, 05 103 37 10.7
अक्तूबर, 05 102 55 15.65
2010 102 91 16.46
्रप्रकाशित : प्रभात खबर 11 अगस्त 2015
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